(Sample Material) सामान्य अध्ययन (पेपर -1) ऑनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रम: भारत और विश्व का भूगोल - "जलवायु"


सामान्य अध्ययन ऑनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रम का (Sample Material)

विषय: भारत और विश्व का भूगोल

जलवायु

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मानसूनी जलवायविक एकता में विविधता (Diversity in the Unity of Indian Monsoon Climate)

भारत के सभी भागों में मानसूनी जलवायु पाई जाती है जो सम्पूर्ण भारत को एकता का स्वरूप प्रदान करती है। परन्तु व्यापक जलवायविक एकता के हेतु हुए भी भारत की जलवायु में प्रादेशिक स्वरूप पाए जाते हैं। ये प्रादेशिक विविधताएँ वायु, तापमान, वर्षा, शुष्कता एवं आर्द्रता के रूप में पाई जाती हैं। अवस्थिति, समुद्रतल से ऊँचाई, समुद्र से दूरी, पर्वतों की दिशा तथा उच्चावच इन विविधताओं को जन्म देते हैं। इन विविधताओं के प्रमुख उदारहण निम्नलिखित हैं।

1. राजस्थान के बाड़मेर क्षेत्रा में जून के माह में दिन का तापमान 48° से 50° सेल्सियम तक हो जाता है, जबकि उसी दिन कश्मीर के पहलगाम या गुलमर्ग में तापमान केवल 22° सेल्सियस तक ही रहता है।
2. दिसंबर के माह में रात्रि के समय द्रास एवं कारगिल का न्यूनतम तापमान दृ40° सेल्सियस तक गिर जाता है जबकि तिरुवनंतपुरम या चेन्नई में तापमान 20° या 22° सेल्सियस तक रहता है।
3. माॅसिनराम की औसत वार्षिक वर्षा 1221 सेंटीमीटर है जबकि जैसलमेर में कुल वार्षिक वर्षा केवल 12 सेंटीमीटर ही है। गारो की पहाड़ियों में स्थित तुरा ;ज्नतंद्ध नामक स्थान पर एक दिन में इतनी वर्षा हो जाती है जितनी जैसलमेर में दस वर्षों में भी नहीं हो पाती।
4. जुलाई तथा अगस्त माह में बंगाल के डेल्टा तथा उड़ीसा के तटीय मैदानों में हर तीसरे या पाँचवें दिन वर्षा वाले प्रचण्ड तूपफान आते हैं जबकि एक हजार किलोमीटर दक्षिण में स्थित कोरोमण्डल तट शुष्क रहता है।
5. जुलाई माह में ब्रह्मपुत्रा की घाटी में भयंकर बाढ़ आती है जबकि राजस्थान में फसलों के लिए जल का अभाव रहता है।
6. मुम्बई जैसे तटवर्ती क्षेत्रों में ऋतु परिवर्तन का प्रभाव अधिक नहीं पड़ता जबकि दिल्ली व आगरा में रहने वाले लोगों को ग्रीष्म तथा शीत ऋतु की भीषणता को सहन करना पड़ता है।
7. गोआ, हैदराबाद, भुवनेश्वर तथा पटना जैसे स्थानों में वर्षा जून के पहले सप्ताह में शुरू हो जाती है जबकि आगरा, दिल्ली, चण्डीगढ़ तथा भोपाल में जून के अन्तिम सप्ताह में वर्षा शुरू होती है।

भारतीय मौसम का रचना-तन्त्रा (Mechanism of Indian Weather)

भारतीय मौसत के रचनात्मक कारकों को मोटे तौर पर निम्नलिखित तीन रूपों में देखा जा सकता है।

  1. दाब तथा वायु का धरातलीय विवरण।
  2. उपरी वायु परिसंचरण (Upper air circulation) वायुराशियों का अन्तर्प्रवाह (Inflow of air masses) तथा जेट प्रवाह।
  3. शीत ऋतु में पश्चिमी विक्षोभों तथा वर्षा ऋतु में उष्ण कटिबन्धीय चक्रवातों के आने से वर्षा होना।

उपर्युक्त रचना-तंत्रा का अध्ययन वर्ष की दो मुख्य ऋतुओं, शीत एवं ग्रीष्म ऋतु के सन्दर्भ में किया जा सकता है -

1. शीतकाल में भारतीय मौसम की रचना-तन्त्रा (Mechanism of Indian Weather in Winter Season) शीतकाल में भारतीय मौसत सामान्यतः मध्य एवं पश्चिमी एशिया के दाब के वितरण से प्रभावित होता है। हिमालय के उत्तर में स्थिति उच्च दाब केन्द्र से प्रायद्वीप की ओर निम्न स्तरीय शुष्क वायु चलने लगती है। मध्य एशिया एवं साइबेरिया के उच्च दाब केन्द्र से बाहर की ओर चलने वाली धरातलीय हवाएँ भारत में शुष्क महाद्वीपीय व्यापारिक पवनों के रूप में पहुँचती हैं। यहाँ उत्तरी-पश्चिमी महाद्वीपीय पवन भारतीय व्यापारिक पवनों के सम्पर्क में आती है। कभी-कभी यह मध्य गंगा घाटी तक पहुँच जाती है जिससे मध्य गंगा घाटी तक का सम्पूर्ण क्षेत्रा उत्तरी-पश्चिमी पवनों के प्रभाव में आ जाति है।

वायु का उपर्युक्त प्रारूप केवल धरातल के निकट ही ठीक है। वायुमंडल के उपरी भाग में वायु का संचरण जेट वायु धाराओं द्वारा स्पष्ट किया जाता है।

(i) जेट वायुधाराएँ: ऋतुओं के अनुसार दिशा बदलने वाली निम्न स्तर की पवनों के अलावा ऊंपरी स्तर पर चलने वाली पवनें भी हैं। ये पवनें धरातल से 6 से 7 किमी. की ऊंचाई पर चलती हैं। ऊंचे स्तरों पर इन पवनों की गति बहुत अधिक हो जाती है। ये पवनें कभी-भी 12 से 16 किमी. की ऊँचाई पर भी चलती है। जिस क्षेत्रा में ये पवनें चलती हैं उसकी अक्षांश्ीय विस्तार ऋतु और ऊँचाई के अनुसार बदलता रहता है। 12 से 13 कि.मी. की ऊँचाई पर इन पवनों की गति 180 कि.मी. प्रति घंटा से अधिक हो जाती है। इन्ही पवनों को जेट वायुधाराएँ कहते हैं। ये दो प्रकार की होती हैं: पहली, पश्चिमी जेट वायुधारा, जो 12 कि.मी. की ऊँचाई पर पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है। दूसरी, पूर्वी जेट वायुधारा जो धरातल से 13 कि.मी. ऊपर से पश्चिम की ओर बहती है। ऋतुओं के अनुसार इन जेट वायुधराओं की स्थिति बदलती रहती है। शीत ऋतु में पश्चिमी जेट वायुधारा का अक्ष हिमालय के दक्षिणी ढालों पर स्थित होता है। लेकिन दक्षिण-पश्चिम मानूसन के आगमन के साथ यह उत्तर की ओर खिसक कर पूरी ऋतु में वहीं रहता है। दक्षिण-पश्चिम मानूसन के दौरान पूर्वी जेट वायुधारा 25 डिग्री उत्तरी अक्षांश वृत्त के दक्षिण में बहती है। जून में यह प्रायद्वीप के दक्षिणी भाग के ऊँपर बहती है। इस समय इसकी गति 90 कि.मी. प्रति घंटा होती है। अगस्त में यह 15° उ. अक्षांश वृत्त पर तथा सितंबर में 22° उ. अक्षांश वृत्त पर सीमित हो जाती है। पूर्वी जेट वायुधारा ऊपरी क्षोभमण्डल में 30° उ. अक्षांश वृत्त के उत्तर की ओर कभी नहीं खिसकती। वर्ष की विभिन्न अवधियों में जेट वायुधाराओं के अक्ष उत्तर या दक्षिण की ओर खिसकते रहते हैं। इनके अध्ययन से दक्षिण-पश्चिम मानसून के आगमन, वर्षा ऋतु में विच्छेद और पीछे हटने का पूर्वानुमान लगाने में सहायता मिलती है।

(ii) पश्चिमी विक्षोभ: उपोष्ण कटिबंध्ीय पछुआ पवनों के ऊपरी वायु के गर्त उत्तर-भारत के ऊपर पूर्व की ओर आगे बढ़ते हैं। भारतीय मौसम विज्ञान में इन्हें पश्चिमी विक्षोभ कहा जाता है। आगे बढ़ते हुए इन गर्तों से पवनें गोल-गोल घूमती हुई चलने लगती हैं। इन्ही के द्वारा शीत ऋतु में वर्षण होता है। पश्चिमी गर्तों और निम्न स्तरीय चक्रवाती तूफानों की उत्पत्ति भूमध्य सागर या पूर्वी अटलांटिक प्रदेशों में होती है। इनके अलावा गौण चक्रवात पश्चिम एशिया के ऊपर बनते हैं। इनके जीवन का इतिहास प्रशांत या अटलांटिक के शीतोष्ण कटिबंधिय चक्रवातों के समान ही जोता है। ये भारत के ऊपर लगभग अधिधारित (अन्तिम) अवस्था (Occluded state) में ही पहुँचते हैं।

2. ग्रीष्मकाल में भारतीय मौसम का रचना-तन्त्रा (Mechanism of Indian Weather in Summer Season) ग्रीष्मकाल के आगमन के साथ ही सूर्य ऊत्तर की ओर स्थानान्तरित हो जाता है और धरातलीय एवं उच्च स्तरीय वायु का परिसंचरण (Circulation) विपरीत दिशा में होने लगता है।

जुलाई में धरातल के निकट भूमध्य रेखिय निम्न दाब कटिबन्ध (Inter-Tropical Covergence Zone-ITCZ) उत्तर की ओर स्थानान्तरित होकर हिमालय के लगभग समानान्तर 25° उत्तरी अक्षांश पर आ जाता है।

इसे भूमध्य रेखीय द्रोणी (Equatorial Trough) भी कहते हैं। इस समय तक पश्चिमी जेट-प्रवाह भारतीय क्षेत्रा से लौट चुका होता है। निम्न दाब का क्षेत्रा होने के कारण यह मध्य रेखीय द्रोणी, वायु को विभिन्न दिशाओं से अपनी ओर आकर्षित करती है। दक्षिणी गोलार्द्ध से सामुद्रिक उष्ण कटिबन्धीय (Maritime Tropical–MT) वायु भूमध्य रेखा को पार करने के पश्चात् इस कम वायु-दाब वाले क्षेत्रा की ओर प्रवाहित होती है। इसी को दक्षिणी-पश्चिमी मानसून कहते हैं।

क्षोभ-मण्डल के ऊपरी स्तरों में दिशा इससे र्बिल्कुल भिन्न होती है। उत्तरी भारत पर एक पूर्वी जेट-प्रवाह 150 मिलीबार चक्रवातों अथवा गर्तों को भारत की ओर आकर्षित करता है। इन गर्तों के मार्ग अधिकतम वर्षा वाले क्षेत्रा हैं।