(Download) संघ लोक सेवा आयोग सिविल सेवा - मुख्य परीक्षा विधि Paper-1 - 2011

UPSC CIVIL SEVA AYOG

संघ लोक सेवा आयोग सिविल सेवा - मुख्य परीक्षा (Download) UPSC IAS Mains Exam 2011 विधि (Paper-1)

खण्ड ‘A’

1. निम्नलिखित के उत्तर दीजिए (प्रत्येक उत्तर लगभग 150 शब्दों का हो) : 
(क) संविधान-रचना की संघटक शक्ति तथा संविधान संशोधन की संघटक शक्ति के अलग-अलग लक्ष्यार्थ और कार्यक्षेत्र हैं। व्याख्या कीजिए।

(ख) “कुछ मामलों में शासन के अन्य दो अवयवों की शक्तियों को हड़प कर न्यायपालिका ने शक्ति के पृथक्करण के सिद्धान्त को कमज़ोर किया है।'' क्या आप सहमत हैं ? समीक्षात्मक व्याख्या कीजिए।

(ग) क्या स्थानीय निकायों को आर्थिक विकास तथा सामाजिक न्याय के क्षेत्र में अपनी भूमिका निभाने में स्वायत्तता प्राप्त है ? व्याख्या कीजिए।

(घ) राज्य का राज्यपाल केवल राष्ट्रपति के 'प्रसादपर्यन्त' तक ही पद पर बना रह सकता है। क्या राष्ट्रपति उसे बिना कारण पदच्युत कर सकता है ? भारतीय संविधान के अन्तर्गत राज्यपाल की स्थिति के सन्दर्भ में परीक्षण कीजिए।

2. (क) समानता एक गतिशील संकल्पना है और इसके अनेक पहलू और आयाम हैं। पारम्परिक सैद्धान्तिक सीमाओं में इसको न तो कुंठित किया जा सकता है, न परिसीमित और न ही इसमें किसी प्रकार की काँट-छाँट की जा सकती है। इसका संकुचन भी नहीं किया जा सकता है। न्यायपालिका ने विभिन्न निर्णयों द्वारा इसके क्षेत्र को किस प्रकार विस्तृत किया है ? व्याख्या कीजिए।

(ख) भारतीय न्यायालयों ने 'जीवन के अधिकार के अन्तर्गत स्वच्छ मानवीय पर्यावरण को भी सम्मिलित कर लिया है। विषय से संबंधित विधि के विकास की चर्चा कीजिए। 

3. (क) डॉ. उपेन्द्र बक्शी के अनुसार 'ए डी एम जबलपुर बनाम शुक्ला' में सर्वोच्च न्यायालय ने "आपातकाल के अन्धकार को पूर्णतया काला कर दिया।" क्या आपके विचार में 1978 के अधिनियम द्वारा किए 44वें संशोधन से अन्धकार दूर हो पाया है और क्या इससे मौलिक अधिकारों का ज़्यादा अच्छा परिरक्षण हो पाया है ? व्याख्या कीजिए। 

(ख) इस बात का परीक्षण कीजिएं कि क्या भारत का निर्वाचन आयोग संविधान के अधिनियम 324 के अन्तर्गत निर्दिष्ट दोनों ज़िम्मेदारियों को सफलतापूर्वक निभा पाया है ? प्रामाणिक निर्वाचन-सूचियों की तैयारी को सुनिश्चित करने के लिए उठाए जाने वाले कदमों के विषय में सुझाव दीजिए। 

4. निम्नलिखित पर आलोचनात्मक टिप्पणियां लिखिए : 

(क) भविष्यलक्षी विनिर्णय का सिद्धान्त

(ख) राष्ट्रपति को सूचना देने विषयक प्रधानमंत्री के कर्त्तव्य

(ग) धर्म-निरपेक्षता।

खण्ड 'B' 

5. निम्नलिखित के उत्तर दीजिए (प्रत्येक उत्तर लगभग 150 शब्दों का हो): । 
(क) एक अतिवादी दृष्टि यह है कि अन्तर्राष्ट्रीय विधि एक . दांडिक अनुशास्तिविहीन प्रणाली है। फिर भी यह पूर्णतया सच नहीं है कि किसी देश को अन्तर्राष्ट्रीय विधि के अनुपालन के लिए विवश नहीं किया जा सकता। अन्तर्राष्ट्रीय विधि के अनुपालन के लिए विभिन्न 
दांडिक प्रावधानों पर टिप्पणी लिखिए।

(ख) मानवाधिकारों की सार्वदेशिक घोषणा सर्वव्यापी है तथा अधिकरणों द्वारा खुले तौर पर इसकी दुहाई दिए जाने पर 'राष्ट्रीय विधि की अन्तर्वस्तु पर किसी सीमा तक इसका प्रभाव पड़ा है। फिर भी यह कोई विधिक दस्तावेज़ नहीं है और इसके कुछ प्रावधानों को विधिक नियमों की संज्ञा नहीं दी जा सकती। इसके कुछ प्रावधान या तो विधि के सामान्य सिद्धांत हैं या ये मानवता की प्रारंभिक धारणा का प्रतिनिधायन करते हैं। कदाचित् इसकी सबसे बड़ी महत्ता यह है कि’ महासभा द्वारा निर्मित चार्टर के प्रावधानों के निर्वचन के निमित्त महासभा द्वारा रचित एक प्राधिकृत. मार्गदर्शिका है।' 

उपर्युक्त कथन पर टिप्पणी कीजिए तथा मानवाधिकारों की सार्वदेशिक घोषणा के महत्व की चर्चा कीजिए।

(ग) 1972 के स्टॉकहोम अधिवेशन की भूमिका सम्पूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय को स्वीकार्य अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरण सम्बन्धी नियमों के निर्माण के. निमित्त ऐसे क्षेत्रों का पता लगाने की रही है कि जिनमें पर्यावरण विषयक नियमों के निर्माण कार्य में आने वाली दुर्गम बाधाओं का सामना करना पड़े। स्टॉकहोम घोषणा-पत्र में उल्लिखित अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरण विधि के सिद्धान्तों का विवेचन कीजिए।

(घ) अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद क्या है ? अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद के मूल कारणों को दूर करने के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा किए गए विभिन्न कार्यों की चर्चा कीजिए।

6. (क) "विधित: एवं वस्तुत: मान्यता के बीच के अन्तर तथा विधित: एवं वास्तविक सरकारों के बीच के अन्तर का सारतः कोई महत्व नहीं है, विशेषतः इसलिए कि किसी भी विशिष्ट विधि-केस में. मूल प्रश्न तो इरादे (आशय) और उसके विधिक परिणामों का रहता है। यदि कहीं कोई अन्तर है भी, तब भी कानूनी तौर पर तत्त्वत: उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। दोनों स्थितियों के अन्तर को स्पष्ट करते हुए टिप्पणी कीजिए। 

(घ) “महासागर में चलने वाले पोतों पर केवल उसी देश का अधिकार होता है जिन पर उस देश का झंडा लगा हुआ है। इसका अर्थ यह हुआ कि महासागर पर. क्षेत्रीय संप्रभुता के अभाव में कोई भी देश किसी दूसरे देश के जहाज़ पर अधिकारिता नहीं बरत सकता।' निर्णयज विधि तथा अन्तर्राष्ट्रीय विधि आयोग के दृष्टिकोण के आलोक में इस सिद्धान्त का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।

7. (क) “यह सिद्धान्त कि “देशों को अनिवार्यतः पारस्परिक विवादों को सुरक्षा एवं न्यायभावना को बिना आँच पहुँचाए शान्तिपूर्वक सुलझाना चाहिए, प्राय: 'इसलिए ठुकरा दिया जाता है कि देश प्रवृत्त्या अपने विवादों को किसी स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायनिर्णयन के समक्ष रखने से बचते हैं, विशेषत: वे किसी, स्वतन्त्र न्यायिक निकाय के बाध्यकारी अधिकार क्षेत्र को पहले से स्वीकार करना नहीं चाहते।' उपर्युक्त वक्तव्य की व्याख्या आज के युग के कम से कम एक विवाद के सन्दर्भ में कीजिए। साथ ही, बातचीत द्वारा समझौते का ऐसा प्रतिमान प्रस्तुत कीजिए जिसकी सहायता से वैश्वीकरण द्वारा प्रदत्त अवसरों का उपयोग करते हुए समझौते को प्रोत्साहन मिले।

(ख) “प्रत्यर्पण नियमत: द्विपक्षीय संधि से प्रभावित होता है। अत: संधि के अभाव में प्रत्यर्पण करना किसी के कर्तव्य क्षेत्र में नहीं आता। इसके अतिरिक्त, सामान्यत: प्रत्यर्पण संधियों का सम्बन्ध केवल गंभीर अपराधों से होता है और उनसे दोनों पक्ष एकसमान बाध्य होते हैं।' अन्तर्राष्ट्रीय विधि की वर्तमान स्थिति के सन्दर्भ में उपर्युक्त अभिकथन की समीचीनता पर अपना मत प्रकट कीजिए। इस तथ्य के प्रकाश में कि आज के युग में अधिकाधिक लोग सेवा अथवा व्यवसाय के सिलसिले में विदेश यात्रा करते हैं, उपर्युक्त कार्यरीति का समीक्षात्मक परीक्षण कीजिए तथा सम्बद्ध विधि में आवश्यक संशोधनों का सुझाव दीजिए। 

8. (क) युद्ध पीड़ितों की सुरक्षार्थ 1949 की चार जेनेवा कन्वेंशनों के अन्तर्गत मैदानी युद्ध में घायलों और बीमारों तथा पोत विध्वंस के पीड़ितों, युद्धबंदियों तथा असैनिक नागरिकों आदि सभी पीड़ितों को समावेश किया गया है। इन सुरक्षाओं का विवेचन कीजिए। 

(ख) संयुक्त राष्ट्र आवश्यकता और परिस्थितियों के अनुरूप विधि विकास करने में सक्षम है। 1950 का 'शान्ति के लिए एकता' संकल्प इसका उदाहरण है।' इस संकल्प की वैधता का विवेचन कीजिए।

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