(आँनलाइन निःशुल्क कोचिंग) सामान्य अध्ययन पेपर - 1: भूगोल "अध्याय - वायुमंडल"

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विश्वय - भूगोल

अध्याय - वायुमंडल

पृथ्वी के चारों ओर कई सौर किमी की मोटाई में व्याप्त गैसीय आवरण को वायुमंडल कहते हैं। वायुमंडल अनेक गैसों का मिश्रण हैं।
ये गैसे निम्नलिखित है-

वायुमंडल की ऊंचाई 16 से 29 हजार किमी तक बतायी जाती है परन्तु धरातल से केवल 800 किमी तक ऊंचा वायुमण्डल ही अधिक महत्त्चपूर्ण है।

वायुमण्डल की परतें:

क्षोभमण्डल

  • यह पृथ्वी की सतह के सबसे नजदीक होती है। इसकी ऊचाई विषुवत रेखा (16 किमी) से ध्रुवों (8 किमी) की ओर जाने पर घटती है। सभी मौसमी घटनाएँ इसी परत में सम्पन्न होती हैं।
  • यह अन्य सभी परतों से घनी है और यहाँ पर जलवाष्प, धूलकण, आर्द्रता आदि मिलते हैं। मौसम सम्बन्धी अधिकांष परिवर्तनों के लिए क्षोममण्डल ही उत्तरदायी है।
  • इस परत में ऊंचाई के साथ-साथ तापमान घटता है। प्रत्येक 165 मीटर पर 1°C तापमान की कमी हो जाती है। इसे सामान्य ताप हास दर कहते हैं।
  • तापहास दर केवल ऊंचाई से ही नहीं बल्कि अक्षांशों से भी प्रभावित होती है। इस नियम के अनुसार यह दर उच्च तापमान वाले धरातल के ऊपर उच्च तथा निम्न तापमान वाले धरातल के ऊपर निम्न होती है।
  • क्षोभमण्डल के ऊपर षीर्ष पर स्थित क्षोभमण्डल सीमा इसे समताप मण्डल से अलग करती है। इसको संवहन मंडल भी कहा जाता है।
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समताप मण्डल

  • इसकी ऊंचाई 50 किमी तक होती है।
  • इसमें तापमान में ऊंचाई के साथ वष्द्धि नहीं होती है। तापमान समान रहता है।
  • यह परत वायुयान चालकों के लिए आदर्ष होती है।
  • इस मण्डल में जल-वाष्प, धूलकण आदि नहीं पाये जाते हैं। इसमें बादलों का अभाव होते है।
  • इस मण्डल में ओजोन परत होती है, जो सूर्य की पराबैंगनी किरणों का अवषोषण करती है। इस कारण ओजोन परत में ऊंचाई के साथ तापमान बढ़ता है।

मध्यमण्डल

  • यह 80 किमी की ऊंचाई तक होता है।
  • इसमें ऊंचाई के साथ तापमान में गिरावट होती है और 80 किमी. की ऊंचाई पर तापमान दृ100°ब् तक हो जाता है।

आयन मंडल - इसे तापमंडल भी कहा जाता है। इस मंडल का फ़ैलाव 50 किमी. से लेकर 400 किमी. की ऊंचाई  तक है। इस मंडल में तापमान तेजी से बढ़ता है। पृथ्वी से प्रेषित रेडियों तरंगें इसी मंडल में टकराकर पुनः पृथ्वी पर वापस लौटती है।

बाह्य मंडल - यह वायुमंडल की सबसे ऊपरी परत है। इसकी बाह्य सीमा पर तापमान लगभग 5568°C तक होता है। इसमें हाइड्रोजन व हीलियम गैसों की प्रधानता होती है।

वायुमंडलीय दाब - धरातल पर या सागर तल पर क्षेत्राफल की प्रति इकाई पर ऊपर स्थित वायुमंडल की समस्त परतों के पड़ने वाले भार को ही वायुदाब कहा जाता है। इसे बैरोमीटर द्वारा मापा जाता है। सागर तल पर वायु दाब अधिकतम होता है। वायुमंडल में जल वाष्प की मात्रा बढ़ने पर वायुदाब में कमी आ जाती है।

वायुदाब पेटियाँ:

विषुवतरेखीय निम्न वायुदाब पेटी

  • इसका विस्तार दोनों गोलार्द्ध में 0° अक्षांश से 5° अक्षांश तक है।
  • यहाँ अधिकतम सूर्यताप प्राप्त होता है, अतः वायु गर्म होकर हल्की हो जाती है और उ$पर उठ जाती है। इससे यहाँ निम्न दाब उत्पन्न हो जाता है।
  • इस क्षेत्रा में वायु लगभग गतिहीन या षान्त होती है। अतः इसे शान्त कटिबन्ध (Doldrums) भी कहते हैं।

उपोष्ण कटिबन्धीय उच्चदाब पेटी

  • इसका विस्तार दोनों गोलाद्धों में 30° से 35° अक्षांशों तक है। अधिक तापमान रहते हुए भी यहाँ उच्च वायुदाब रहता है इसका कारण पृथ्वी दैनिक गति एवं वायु में अवकलन एवं अपसरण है।
  • भूमध्य रेखा से लगातार पवनें उठकर यहाँ एकत्रित हो जाती है एवं साथ ही उपध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी से भी हवाएँ एकत्रित होती है। इस कारण यहाँ वायुदाब अधिक होता है।
  • इस पेटी को अश्व अक्षांश भी कहते हैं क्योंकि प्राचीन काल के नाविकों को इस क्षेत्रा में उच्चदाब के कारण काफी कठिनाई होती थी। अतः उन्हें जलयानों का बोझ हल्का करने के लिए कुछ घोड़े समुद्र में फ़ेकने पड़ते थे।

उपध्रुवीय निम्न दाब पेटी

  • इसका विस्तार दोनों गोलाद्धों में 60° से 65° अक्षांशों तक है।
  • यहाँ तापमान कम होने के बावजूद भी दाब निम्न है क्योंकि पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण यहाँ से वायु बाहर की ओर फ़ैलकर स्थानारित हो जाती है, अतः वायुदाब कम हो जाता है।
  • इसका दूसरा कारण ध्रुवों पर अत्यधिक उच्च दाब की उपस्थिति है।

ध्रुवीय उच्च दाब पेटी

  • अत्यधिक शीत के कारण दोनों ध्रुवों पर उच्च दाब पाया जाता है।

पवन:

एक स्थान से एक निष्चित दिषा को चलती हुई वायु को पवन कहते हैं। ये हमेषा उच्च दाब से निम्न दाब की ओर चलती है। हवाएँ निम्नलिखित तीन प्रकार की होती है -

1. स्थायी पवनें

  • इन्हें प्रचलित पवनें एवं सनातनी पवनें भी कहते हैं।
  • ये पवनें सदैव एक ही क्रम में वर्षभर एक निष्चित दिषा की ओर चलती है।
  • स्थायी पवन तीन प्रकार की होती हैं-
  • व्यापारिक पवने 30° उत्तरी व दक्षिण अक्षांशो से 0° अक्षांश रेखा की ओर बहने वाली पवन को व्यापारिक पवन कहते हैं। इन हवाओं से पालयुक्त जलयान के संचालन में सुविधा होती थीं इसी कारण इन्हें व्यापारिक पवनों का नाम दिया गया। उत्तरी गोलार्द्ध में इनकी दिषा उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम तथा दक्षिण-पश्चिम होती है।

  • पछुआ पवने 30°.35° उत्तरी तथा दक्षिणी अक्षांशो से 60°.65° अक्षांशों की ओर बहने वाली पवन पछुआ पवनें कहलाती हैं। ये विरुद्ध व्यापारिक पवनें भी कहलाती हैं। उत्तरी गोलार्द्ध में इनकी दिषा दक्षिण-पश्चिम उत्तर-पूर्व होती है। दक्षिण गोलार्द्ध में उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व होती है। दक्षिण गोलार्द्ध में समुद्र अधिक होने के कारण इनकी गति बहुत तीव्र होती है। इसी कारण इस गोलार्द्ध में 40° अक्षांशों के बीच इन्हें ‘गजरते चालीसा’, 50°, अक्षांशों में ‘भयंकर पचासा’ और 60° अक्षांशों में चीखता साठा’ कहा जाता है।

  • ध्रुवीय पवने ये ध्रुवीय उच्च दाव से उपध्रुवीय निम्न दाब की ओर चलती है। उत्तरी गोलार्द्ध में इनकी दिषा उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व होती है। ये पूर्वी पवनें होती है एवं उत्तरी गोलार्द्ध में इन्हें नाॅर इस्टर्स कहा जाता है।

2. सामयिक पवनें

  • मौसम और समय परिवर्तन के साथ जिन पवनों की दिषा में परिवर्तन हो जाता है उन्हें सामायिक पवन कहते हैं।
  • मानसून इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।

3. स्थानीय पवन

  • जिन पवनों का विकास स्थानीय स्तर पर तापमान एवं वायुदाब में अन्तर के कारण होता है उन्हें स्थानीय पवन कहते हैं।
  • कुछ महत्त्वपूर्ण स्थानीय पवनें निम्नलिखित हैं -

गर्म एवं शुष्क स्थानीय पवन:

ठंडी स्थानीय पवन:

चक्रवात व प्रतिचक्रवात:

  • अस्थिर एवं परिवर्तनषील दवाओं के वायुमण्डलीय भँवर जिनके केन्द्र से निम्न वायुदाब और केन्द्र के बाहर उच्च वायुदाब होता है, चक्रवात कहलाती है।
  • चक्रवात के ठीक विपरीत प्रतिचक्रवात में निम्न वायुदाब के वष्त्ताकार रेखाओं के केन्द्र में उच्च वायुदाब होता है। इस स्थिति में हवाएँ केंद्र से बाहर परिधि की तरफ चलती है।
  • चक्रवात की दिषा उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी की सूई की विपरीत होती है तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सूई की दिषा में होती है।
  • प्रतिचक्रवात की दिषा चक्रवात के ठीक विपरीत होती है, अर्थात् उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी की सूई के अनुवू$ल एवं दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सूई के विपरीत होती है।
  • चक्रवातों को अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग नाम होते हैं।

यथा -

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