(Download) संघ लोक सेवा आयोग सिविल सेवा 2018 - मुख्य परीक्षा सामान्य अध्ययन-हिंदी भाषा (Hindi Language)

UPSC CIVIL SEVA AYOG


(Download) संघ लोक सेवा आयोग सिविल सेवा 2018 - मुख्य परीक्षा सामान्य अध्ययन-हिंदी भाषा


Q1. निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर 600 शब्दों में निबन्ध लिखिए :

(a) लोकतंत्र में न्यायपालिका की भूमिका
(b) पर्यावरण और आत्मनिर्भरता
(c) भूमंडलीकरण में भाषा की भूमिका
(d) भारतीय अर्थव्यवस्था और उसकी चुनौतियाँ

Q2. निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उसके आधार पर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर स्पष्ट, सही और संक्षिप्त भाषा में दीजिए :

संसार का ध्यान गाँधी जी की ओर इसलिए आकृष्ट हुआ कि उन्होंने पशु-बल के समक्ष आत्म-बल का शस्त्र निकाला, तोपों और मशीन-गनों का सामना करने के लिए अहिंसा का आश्रय लिया। किन्तु सोचने की बात यह है कि अहिंसा का आश्रय उन्होंने क्यों लिया? क्या इसलिए कि अंग्रेज़ों के विरुद्ध हिंसा का आश्रय लेकर वे भारत को स्वाधीन नहीं कर सकते थे? अथवा इसलिए कि मानव-समाज को वे यह शिक्षा देना चाहते थे कि मनुष्य जब तक पाशविक साधनों का प्रयोग करने को बाध्य है, तब तक वह पूरा मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं हो सकता? पहली बात अहिंसा को कमज़ोर एवं निरुपाय व्यक्ति का साधन बताती है, जिसका अर्थ यह होता है कि तोपें जब हमारे पास नहीं हैं, तब सत्याग्रह ही सही। किन्तु दूसरी बात अहिंसा को मनुष्य के विकास का साधन बनाती है, उसके रूप को निर्मल बनाने का उपाय सिद्ध करती है।

यह सच है कि गाँधी जी के नेतृत्व में जब भारतवासी ब्रिटेन से संघर्ष कर रहे थे, तब उनमें से अधिकांश का यही भाव था कि अहिंसा साधन भर है, जिसको अवलंब हमने इसलिए लिया है।कि हिंसक साधनों से अंग्रेज़ों का सामना करने की हमें सुविधा और सुयोग नहीं है। किन्तु स्वयं गाँधी जी इस विचार को नहीं मानते थे। अहिंसा को गंवाकर वे भारत को स्वाधीन करने के पक्षपाती नहीं थे। भारतीय स्वाधीनता बहुत बड़ा लक्ष्य थी, उससे भी बड़ा ध्येय मानव-स्वभाव में परिवर्तन लाना था, मनुष्य को यह विश्वास दिलाना था कि जिन ध्येयों की प्राप्ति के लिए वह पाशविक साधनों का सहारा लेता है, वे ध्येय मानव-मूल्यों से भी प्राप्त किए जा सकते हैं।

गाँधी जी का मुख्य उद्देश्य न केवल अपने देशवासियों के कष्टों का निवारण, प्रत्युत मनुष्य के पाशवीकरण का अवरोध भी था घृणा, क्रोध और आवेग, ये पशुओं को ही होते हैं और वे भी अपने प्रतिपक्षी का सामना उन शस्त्रों से करते हैं।लेकिन मनुष्य पशु से भिन्न है, अतएव उचित है।कि वह अपने आवेगों पर नियंत्रण लगाए और अपने दैनिक जीवन की समस्याओं के सुलझाने में उन उपायों से काम ले, जो पशुओं के लिए दुर्लभ, किन्तु मनुष्य के लिए सुलभ हैं। प्रश्न उठता है।कि गाँधी जी ने ऐसा निश्चय क्यों किया? और अहिंसा का यह प्रयोग किसी अन्य देश में आरंभ न होकर भारत में ही क्यों आरंभ हुआ? बहुत से लोग इस प्रश्न को यह कहकर टाल देंगे कि यह आकस्मिक बात थी। किन्तु आकस्मिक बात यह थी नहीं। कहते हैं, सत्याग्रह अथवा सविनय अवज्ञा की कल्पना अमेरिका के चिंतक धुरो ने भी की थी और इसकी थोड़ी-बहुत झलक रूस के संत साहित्यकार टॉलस्टॉय, को भी मिल चुकी थी। गाँधी जी थुरो और टॉलस्टॉय, दोनों के ही विचारों से परिचित थे। अपने देश में भी गाँधी जी से पूर्व, अरविन्द सविनय अवज्ञा और असहयोग का सुझाव देश के सामने रख चुके थे।

फिर महत्त्वपूर्ण सवाल है कि इसका प्रयोग सबसे पहले भारत ने ही क्यों किया? उत्तर स्पष्ट है कि आत्म-बल शारीरिक बल से श्रेष्ठ है, इस सत्य को जितना भारतवासी जानते थे, उतना अन्य देशों के लोग नहीं। थुरो, टॉलस्टॉय अथवा एमर्सन और रोम्या रोल में इस प्रकार की जब भी कोई भावना जगी, तब उसके पीछे भारतीय दर्शन की उत्तेजना काम कर रही थी। सविनय अवज्ञा की कल्पना तक जाने का दर्शन इस देश में विद्यमान था और इस कल्पना तक वही व्यक्ति जा सकता था जो या तो भारतीय विचारधारा से प्रभावित हो अथवा अनायास उस प्रकार की चिंतन-पद्धति पर आ गया हो जो भारत की पद्धति रही है।थुरो और टॉल्स्टॉय के संबंध में दोनों ही विकल्प संभव रहे होंगे। रह गए अरविन्द, सो वे भारतीय थे ही।

(a) संसार का ध्यान गाँधी जी की ओर किसलिए आकृष्ट हुआ?
(b) स्वाधीनता-प्राप्ति के लिए गाँधी जी द्वारा अहिंसा को ही क्यों मुख्य साधन माना गया?
(c) लेखक ने मनुष्य और पशु में क्या अंतर बताया है?
(d) अहिंसा का प्रयोग भारत में ही क्यों आरंभ हुआ?
(e) सविनय अवज्ञा की कल्पना तक कौन जा सकता था?

Q3. निम्नलिखित अनुच्छेद का सारांश लगभग एक-तिहाई शब्दों में लिखिए। इसका शीर्षक लिखने की आवश्यकता नहीं है। सारांश अपने शब्दों में ही लिखिए।

आज के आधुनिक मनुष्य को इतिहास और समय के नियमों-कानूनों का जितना ज्ञान है, उतना शायद पहले किसी युग में प्राप्त नहीं था। असली अर्थ में वह ऐतिहासिक मनुष्य है।एक तरह से इतिहास-बोध ही आधुनिकता का पर्याय मान लिया गया है। मध्यकालीन संस्कृति में धर्म का जो केन्द्रीय स्थान था, उसने धीरे-धीरे पीछे हटते हुए अपनी जगह इतिहास को समर्पित कर दी है।मनुष्य प्रकृति के परिवेश में नहीं, इतिहास के संदर्भ में जीता है - इस संदर्भ में हर घटना पिछली घटना से नयी है, जो अब हो रहा है वह पहले कभी नहीं हुआ।मनुष्य के क्रमिक विकास का यह बोध प्राचीन यूनानियों के लिए अजनबी और पराया था।भारतीय मनीषियों के लिए भी यह उतना ही अजनबी था।वे समय को विकास के रूप में नहीं, चक्र के रूप में देखते थे।पहले परपरा मनुष्य के भीतर थी, जो उसकी जीवन-शैली को अनशासित करती थी, अब इतिहास के भविष्य को निर्धारित करता है और परंपरा खोजने के लिए उसे पीछे की ओर देखना पड़ता है।

किन्तु यह बात सच है कि इतिहास का जो प्रभुत्व आज हमारे जीवन में है वह पहल नहीं था, वहाँ यह बात भी उतनी ही सत्य है कि मनुष्य आज समय और इतिहास से परेशान हो। उन्नीसवीं शती में सार्वभौमिक सत्ता से संपन्न जो इतिहास-बोध मनुष्य की प्रगति और मुक्ति का संदेश लाया था, वह हमारे समय तक आते-आते अपनी ही क्रूर पेरोडी में परिवर्तित होता दिखाई देता है। भविष्य को निर्धारित करने वाले नियम, कानून, फार्मूले अब भी हैं किन्तु उन पर बीसवीं शताब्दी के अत्याचारों और मोहभंग का इतना गहरा प्रभाव है कि वे भविष्य के बंद कमरों में कहीं फिट नहीं है।पाते। कैसा है यह वैज्ञानिक, तर्कशील, गौरवपूर्ण अर्थबोध, जिसने आज मनुष्य को स्वयं अपने ही भविष्य के प्रति इतना अरक्षित, आतंकित और अनाश्वस्त बनाकर छोड़ दिया है?
यह नहीं कि हम मानव भविष्य के बारे में जानते नहीं। आज के आधुनिक मनुष्य ने इतिहास-बोध से उत्प्रेरित होकर भविष्य के बारे में जो परिकल्पना और संभावना खोजी हैं, उनके आधार पर संपूर्ण भविष्य की पूरी एक रसायन शाला बनायी जा सकती है।किन्तु इस भविष्य का वर्तमान की विभीषिका से कोई संबंध नहीं, बल्कि यूँ कहें, वर्तमान की विभीषिका से बचने के लिए ही इस ऐतिहासिक भविष्य का निर्माण किया गया है - वह चाहे वर्गहीन समाज का स्वप्न हो या कम्प्यूटर-निर्धारित 'रोबो' का यंत्रलोक, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। हम वास्तविक समय में नहीं, एक काल्पनिक समय में जीते हैं - और विचित्र बात यह है कि इस भविष्य में मनुष्य की मृत्यु को देश-निकाला दे दिया गया है क्योंकि स्वयं अपनी मृत्यु से भयभीत होकर हमने भविष्यलोक में शरण ली है।
यह आधुनिक युग की विचित्र विडंबना मानी जाएगी कि एक तरफ़ आज का मनुष्य इतिहास-बोध' से आक्रांत है, दूसरी तरफ़ मृत अतीत और काल्पनिक भविष्य के बीच स्वयं इतिहास की जीवंत धारा सूख गयी है। जिस तरह नदी में डूबता आदमी पानी से रिश्ता नहीं जोड़ पाता उसी तरह इतिहास में डूबा मनुष्य समय का मर्म नहीं जान सकता। वह इतिहास से प्रभावित हो सकता है, किन्तु उसे अपने जीवन और मृत्यु का साक्षी नहीं बना सकता; वह इतिहास जो इस धरती पर मनुष्य का साक्षी न बन सके, उसका क्या अर्थ रह जाता है? यही कारण है कि आज इतिहास-बोध आधुनिक मनुष्य का अंधविश्वास बनकर रह गया है जिसके पास वह भविष्य का अर्थ टटोलने नहीं, वर्तमान से छुटकारा पाने जाता है।

किन्तु क्या हम वर्तमान से छुटकारा पा सकते हैं? क्या वर्तमान ही ऐसा केन्द्रविन्टनी। जहाँ मनुष्य अपनी नश्वरता के बावजूद इतिहास में अपनी संपूर्ण स्थिति को समझने योग्य है, उनके एक तरफ तो मनुष्य नश्वर है दूसरी ओर वह इतिहास में जीवित है। यह नियति उसके अतीत से सम्बन्ध रखती है, किन्तु उसके साथ वह मनुष्य के समग्र भविष्य को भी आलो करती है जिसमें दूसरे लोगों की नियति भी जुड़ी है।
निम्नलिखित गद्यांश का अंग्रेज़ी में अनुवाद कीजिए :

वर्तमान युग सूचना प्रौद्योगिकी का युग है। विज्ञान के क्षेत्र में हो रहे नवीन आविष्कारा मानव जाति को जिन विस्मयकारी उपलब्धियों से संपन्न बनाया है, उनमें सूचना तकनीक प्रमुख है विश्व के किसी भी कोने में बैठकर आज हम वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से कहीं से भी कोई भी सूचना प्राप्त कर सकते हैं।सूचना प्राप्ति की इस सुविधा ने देशों की दूरियाँ समाप्त अब लगता है कि संपूर्ण संसार सिमटकर हमारी मुट्ठी में आ गया है।वैसे भी वैश्वीकरण' और
‘वसुधैव कुटंबकम्’ की अवधारणा वैज्ञानिक प्रगति के इस युग में तेज़ी-से फलीभूत होता त्र रही है।

आज हम उस युग को याद करें जब डाक भेजने की उपयुक्त व्यवस्था नहीं थी। सूचनाओं का आदान-प्रदान संदेशवाहकों द्वारा होता था। इस काम में लंबा समय लगता था।उस समय तक जीवन कितना कठिन रहा होगा इसका सहज अनुमान लगाना आज आसान नहीं है। समय ने करवट ली और सूचना के क्षेत्र में नित्य नए प्रयोग होने लगे। डाक-तार, टेलीफ़ोन, टेलीग्राम आदि की व्यवस्था की गयी। पत्रों द्वारा संदेश पहुँचने लगे। जीवन में गति आयी तथा रेडियो और टेलीविज़न ने इस दिशा में कदम बढ़ाए। कम्प्यूटर के आगमन के साथ ही सूचना जगत में क्रांति का सूत्रपात हो गया। इंटरनेट के विकास के बाद सारे कम्प्यूटर आपस में जुड़ गए तथा त्वरित संप्रेषण में और भी आसानी हो गयी। सूचना जगत में नए-नए परिवर्तन आ रहे हैं तथा नवीन से नवीन जानकारी तुरंत मिल जाती है।आज मनुष्य अपने किसी उत्पाद का विज्ञापन संपूर्ण विश्व में कहीं भी आसानी से कर सकता है। वह पारंपरिक हथियारों से लड़े बिना युद्ध कर सकता है। लगभग सभी घरों और कार्यालयों में आज कम्प्यूटर और इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध है जिसकी सहायता से हवाई जहाज, रेल, बस और सिनेमा आदि के टिकट आसानी से बुक किए जा सकते हैं। आरक्षण की स्थिति की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।सड़क यातायात की हालत का पता लगाया जा सकता है। आज मोबाइल पर इंटरनेट के माध्यम से सब-कुछ घर बैठे प्राप्त किया जा सकता है। सचमुच संवाद और सूचना संप्रेषण का यह सबसे सस्ता साधन है।

निम्नलिखित गद्यांश का हिन्दी में अनुवाद कीजिए :

Democracy stands much superior to any other form of government in promoting dignity and freedom of the individual. Every individual wants to receive respect from fellow beings. Often conflicts arise among individuals because some feel that they are not treated with due respect. The passion for respect and freedom are the basis of democracy, Democracies throughout the world have recognised this, at least in principle. This has been achieved in various degrees in various democracies. For societies which have been built for long on the basis of subordination and domination, it is not a simple matter to recognise that all individuals are equal.
Take the case of dignity of women. Most societies across the world were historically male dominated societies. Long struggles by women have created some sensitivity today that respect to and equal treatment of women are necessary ingredients of a democratic society. That does not mean that women are actually always treated with respect. But once the principle is recognised, it becomes easier for women to wage a struggle against what is now unacceptable legally and morally.

(a) निम्नलिखित मुहावरों का अर्थ स्पष्ट करते हुए उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए:

(i) उड़ती चिड़िया पहचानना
(ii) नाकों चने चबवाना
(iii) छाती पर मूंग दलना
(iv) सेमल का फूल होना
(v) पौ बारह होना

(b) निम्नलिखित वाक्यों के शुद्ध रूप लिखिए :

(i) आप अपना काम स्वयं कर लो।
(ii) मुझे भगवान पर आत्मविश्वास है।
(iii) इस गीत की दो-चार लड़ियाँ सुना दो।
(iv) मेरे को खाना दे दीजिए।
(v) वे इस ज़िले के धनी व्यक्ति है।

(c) निम्नलिखित शब्दों के दो-दो पर्यायवाची लिखिए :

(i) बादल
(ii) जीभ
(iii) अमृत
(iv) सूर्य
(v) परिवार

(d) निम्नलिखित युग्मों का इस तरह से वाक्य में प्रयोग कीजिए कि उनका अर्थ एवं अंतर स्पष्ट हो जाए।

(i) नीरज – नीरद
(ii) अवलंब - अविलंब
(iii) अन्न – अन्य
(i) अनल – अनिल
(iv) उपयुक्त - उपर्युक्त

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