(Sample Material) सामान्य अध्ययन (पेपर -1) ऑनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रम: भारत और विश्व का भूगोल - "महाद्वीपों एवं महासागरों की उत्पत्ति"

सामान्य अध्ययन ऑनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रम का (Sample Material)

विषय: भारत और विश्व का भूगोल

महाद्वीपों एवं महासागरों की उत्पत्ति

पूर्ण सामग्री के लिए ऑनलाइन कोचिंग मे शामिल हो

हार्ड कॉपी (Hard Copy) में जीएस पेपर 1 (GS Paper - 1) अध्ययन किट खरीदने के लिए यहां क्लिक करें

वेगनर का महाद्वीपीय विस्थापना सिद्धान्त (Wegener' s Theory of Continental Drift)

प्रोफेसर अल्फ्रेड वेगनर (Alfred Wegener) एक जर्मन विद्वान थे जिन्होने सन् 1912 मे महाद्वीपीय विस्थापना सिद्धान्त का प्रतिपादन किया तथा 1924 मे इसका संशोधित रूप प्रस्तुत किया।

सिद्धान्त की रूप रेखा - वेगनर ने अटलांटिक महासागर के पूर्वी और पश्चिमी तटों के बीच अद्भूत समानता देखी । उसने स्पष्ट किया कि दक्षिणी अमेरिका मे ब्राजील का उभार अफ्रीका की गिनी की खाड़ी मे भली भाँति सटाया जा सकता है। इसी प्रकार उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तट का सम्बन्ध पश्चिमी यूरोप के तट के साथ जोड़ा जा सकता है। पूर्वी अफ्रीका मे इथोपीया तथा इरीटीरिया का उभार पश्चिमी भारत तथा पाकिस्तान की तट रेखा से संयुक्त किया जा सकता है। आस्ट्रेलिया बंगाल की खाड़ी मे फिट हो सकता है। वेगनर ने इसे साम्य स्थापना (Jigsaw Fit) का नाम दिया।

महाद्वीप संचलन के प्रमाण (Evidence of Movement of Continents)

वेगनर ने अपने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के पक्ष में कई प्रमाण एकत्रित किए। कुछ महत्वपूर्ण प्रमाणों का संक्षिप्त विवरण नीचे दिया गया है:

1. पर्वत पट्टी - भूवैज्ञानिक क्रियाओं के फलस्वरूप 47 करोड़ से 35 करोड़ वर्ष पुरानी पट्टी का निर्माण एक अविच्छिन्न कटिबन्ध के रूप में हुआ था। ये पर्वत अब अटलांटिक महासागर द्वारा पृथक कर दिए गए हैं।

2. जीवाश्म- वेगनर ने अपने महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत को जीवाश्मों के वितरण के आधार पर स्पष्ट करने का प्रयास किया। उदाहरणतया, ग्लोसोप्टैरिस नामक पौधे तथा मैसोसौरस एवं लिस्ट्रोसौरस नामक जंतुओं के जीवाश्म भारत, आस्ट्रेलिया, दक्षिणी अफ्रीका, दक्षिणी अमेरिका, फाकलैण्ड द्वीप, अण्टार्कटिक महाद्वीप आदि में पाये जाते हैं। वर्तमान समय में ये सभी प्रदेश एक-दूसरे से बहुत दूर स्थित हैं और इस प्रकार का वितरण महाद्वीपों के विस्थापन द्वारा ही स्पष्ट हो सकता है।

3. भूवैज्ञानिक अनुरूपता- अफ्रीका के घाना तट पर नदी जलोढ़ में स्वर्ण निक्षेपों की उपस्थिति तथा उसी क्षेत्रा में इन निक्षेपों की उद्गम शैलों की अनुपस्थिति एक महत्वपूर्ण तथ्य है। लगभग 5,000 कि.मी. चैड़े अटलांटिक महासागर के पार दक्षिणी अमेरिका में ब्राजील के बेलेन साओ मंे स्वर्ण-युक्त शिराओं वाले शैल मिलते हैं, परंतु निकटवर्ती तटीय पट्टी के जलोढ़ में सोने के निक्षेप नहीं हैं। इतने दूर स्थित क्षेत्रों में इतनी समानताएँ महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के अनुरूप हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि दक्षिणी अमेरिका तथा अफ्रीका पैंजिया के भाग थे, जो बाद में एक-दूसरे से दूर चले गए। इस तथ्य की पुष्टि अफ्रीका तथा दक्षिणी अमेरिका के मानचित्रों को एक साथ व्यवस्थित करके की जा सकती है ब्राजील में सोनायुक्त अवसाद ढाल के नीचे परिवाहित करके लाया गया और मिट्टी में जमा किया गया। यह पट्टी वर्तमान घाना तट है।

4. पुराजलवायवी एकरूपता- पुराजलवायु का अर्थ पृथ्वी के भूगर्भिक इतिहास के किसी प्राचीन काल मे पाई जाने वाली जलवायु है । पर्मोकार्बनी काल के मोटे हिमानी निक्षेप युरूग्वे ब्राजील, अफ्रीका, दक्षिणी भारत, दक्षिणी आस्ट्रेलिया तथा तस्मानिया मे दीखाई देते है इन अवसादो की प्रकृति मे एकरूपता पाई जाती है जिससे यह सिद्ध होता है की भू वैज्ञानिक अतीत काल मे ये समस्त महाद्वीप देश एक दूसरे से जुड़े हुए थे और इनमे एक जैसी जलवायु पाई जाती है आज ये भू -भाग भिन्न - भिन्न जलवायु क्षेत्रो - उष्णकटिबंधीय से शीतोष्ण मे स्थित है और बड़े बड़े महासागरो द्वारा एक दूसरे से पृथक किए गए है।

5. प्रवाल- प्रवाल एक प्रकार की कैल्शियमयुक्त चटृान है जो पोलिप नामक सूक्ष्म समुद्री जीव के अस्थिपंजर से बनती है । ये लगभग 200 से0 मी0 से तापमान वाले गर्म जल से पनपते है। अतः ये मुख्यतः 300 उतर तथा 300 दक्षिण अक्षांशो के बीच ही रहते है। इस क्षेत्रा से बाहर के महाद्वीपो पर प्रवालों को पाया जाना इस बात का ठोस प्रमाण है कि प्राचीन भू वैज्ञानिक काल मे ये महाद्वीप भूमध्य रेखा के निकट स्थित थे। महाद्वीपो का संचलन उतर दिशा की ओर हुआ है जिस कारण ये प्रवाल वर्तमान शीत एवं उष्ण जलवायु का अनुभव करते है।

6. ध्रुवों का घुमना (Polar Wandering) पुराचुम्बत्व भू वैज्ञानिक प्राचीन काल मे पृथ्वी का चुम्बकत्व से हमे महाद्वीपो के पैंजिया के रूप मे एक दूसरे से जुड़े होने का सबसे शक्तिशाली प्रमाण मिला है मैग्मा, लावा, तथा असंगत अवसद ने उपस्थित चुम्बकीय प्रवृति वाले खनिज जैसे मेग्नेटाइट, हमेटाइट, इल्मेनाइट, तथा पाइरोटाइट इसी प्रवृति के कारण उस समय के चुंबकीय क्षेत्रा के समानातर एकत्रित हो गए। यह गुण शैलो मे स्थाई चुम्बत्व के रूप मे अभिलेखित किया जाता है । इसे ध्रुवों का घूमना कहते है।


GET DAILY NEWSLETTER for UPSC Exams

DONT FORGET TO CHECK AND CONFIRM YOUR EMAIL LINK.