(Sample Material) सामान्य अध्ययन (पेपर -1) ऑनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रम: भारत और विश्व का भूगोल - "पृथ्वी की उत्पत्ति"

सामान्य अध्ययन ऑनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रम का (Sample Material)

विषय: भारत और विश्व का भूगोल

पृथ्वी की उत्पत्ति

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परिचय

पृथ्वी सौरमण्डल के नौ ग्रहों में से एक ग्रह है।

सौरमण्डल में पृथ्वी का विशिष्ट स्थान है क्योकि सौरमण्डल के सभी ग्रहों मे से पृथ्वी ही एक ऐसा ग्रह है जहाँ पर जीवन पाया जाता है। अंतरिक्ष से देखने पर पृथ्वी एक नीले तथा चमकीले गोले के समान दिखाई देती है। इसका मुख्य कारण यह है कि भूतल का अधिकांश भाग जल से घिरा हुआ है जिसका रंग नीला होता है। पृथ्वी की उत्पत्ति, आकार, विस्तार तथा इसके खगौलीय संबंधों के बारे में प्राचीन काल के विद्धानों ने अलग अलग विचार व्यक्त किए।

सूर्य इसके नौ ग्रह तथा उनके अनेक उपग्रह एक पूरे परिवार की रचना करते है जिसे हम सौरमण्डल कहते है। सौरमण्डल के सदस्यों का संक्षिप्त विररण तालिका में दिया गया है।

पृथ्वी की उत्पत्ति (Origin of the Earth) यह कहना कठिन है कि पृथ्वी की उत्पत्ति कैसे हुई ।

इस विषय में विभिन्न विद्धानो नें भिन्न-भिन्न विचार प्रकट किए है पर्र्रन्तु अधिकांश विद्धानों का मत है कि अन्य ग्रहो की भाँति पृथ्वी की उत्पत्ति भी सूर्य से हुई है ।

कांट का गैसीय राशी सिद्धंात प्रोफेसर इमैनुल कांट  जर्मनी के दार्शनिक थे ने सन् 1755 में पृथ्वी की उत्पत्ति के संबंध में गैसीय राशी सिद्धांत प्रस्तुत किया। उनके अनुसार प्रारंभ में आद्य पदार्थ ठंडा तथा समान रूप से कणो के रूप में बिखरा हुआ था। गुरूत्वाकर्षण के कारण ये कण आपस में टकराए इससे उनका तापमान बढ़ा तथा कोणीय वेग उत्पन्न हुआ कोणीय वेग से आद्य पदार्थ में घूर्णन उत्पन्न हुआ।

लाप्लास का नीहारिका सिद्धांत: लाप्लास महान फ्रांसीसी गणितज्ञ थे जिन्होने पृथ्वी की उत्पत्ति से संबंधित नीहारिका सिद्धांत सन् 1796 में प्रस्तुत किया। लाप्लास के अनुसार आद्य पदार्थ बहुत ही गर्म था तथा मंद गति से घूर्णन कर रहा था। इस गर्म तथा मंद गति से घूमते हुए गैस के बादल को नीहारिका कहते है। इसी के नाम पर इस परिकल्पना का नाम नीहारिका सिद्धांत रखा गया है।

संघट्ट परिकल्पना (Collision Hypothesis) ब्रिटेन के प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर जेम्स जींस ने सन् 1919 में ज्वारीय परिकल्पना का प्रतिपादन किया तथा अन्य वैज्ञानिक सर हैराँल्ड जेफ्रीज ने सन् 1929 में इसमे कुछ संशोधन किया। इस परिकल्पना के अनुसार आरंभ में सूर्य एक गैस का पिंड था। एक अन्य सूर्य से बहुत बड़ा तारा किसी कारणवश सुर्य के निकट आया और अपनी गुरूत्वाकर्षण शक्ति द्वारा सुर्य के गैसीय पदार्थ को अपनी ओर आर्कषित कर लिया।


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