यूपीएससी आईएएस (मेन) हिन्दी अनिवार्य परीक्षा पेपर UPSC IAS (Mains) Hindi Compulsory Exam Paper - 1994

यूपीएससी आईएएस (मेन) हिन्दी अनिवार्य परीक्षा पेपर UPSC IAS (Mains) Hindi Compulsory Exam Paper - 1994

Time allowed: 3 Hours
Maximum Marks: 300

Condidates should attempt ALL questions.

1. निम्नलिखित विषयों में से किसी एक पर लगभग 300 शब्दों में निबन्ध लिखिएः 100

(क) पृथ्वी ग्रह की सुरक्षा
(ख) चापलूसी की कला
(ग) परीक्षाविहीन शिक्षा
(घ) प्रकृति का आनन्द
(ङ) भारतीय त्यौहार

2. निम्नलिखित अवतरण को ध्यान से पढ़िए और इसके बाद दिए गए प्रश्नों के उत्तर अपने शब्दों में लिखिएः

नागरिकता का तात्पर्य वोट देने, कर चुकाने, न्यायसभा में निर्णय करने, तथा उन अन्यान्य कर्तव्यों को पूरा करने से कहीं अधिक है जिनकी अपेक्षा कोई राष्ट्र अपने सदस्यों से करता है। ठीक-ठीक समझने पर इसके अन्तर्गत मनुष्य के वे संपूर्ण क्रिया-कलाप समाविष्ट हो जाते हैं जिनका सम्बन्ध उसके साथी नागरिकों से है तथा जिनका प्रभाव राज्य के स्वास्थ्य एवं कल्यण पर पड़ता है। प्रकारांतर से इस भावना का विस्तार अपने पड़ोसी के प्रति कर्तव्य-निर्वाह तक माना जा सकता है। इसमें कानून द्वारा विहित सभी बातें तो अन्तर्निहित हैं ही, साथ ही कुछ ऐसे कर्तव्य भी समाविष्ट हैं जिनके विषय में कानून चुप है और जिन्हें व्यक्ति के विवेक पर छोड़ दिया गया है। यह भावना निष्क्रिय नहीं है। इसका अभिप्राय अभद्र आचरण से निवृत्ति मात्रा नहीं है। यह एक सक्रिय भावना है। सार्वजनिक कर्तव्यों से दूर रहने वाले मनुष्य को हम ‘‘शांतिप्रिय’’ नहीं, बल्कि निकम्मा मनुष्य समझते हैं। सार्वजनिक जीवन में शक्ति और र्उ$जा की स्थिति निर्मित होती है। समय चूकने वाला मनुष्य, तथा शत्राु का साथ देने वाला मनुष्य, दोनों ही अपने कर्तव्यों का अतिक्रमण करते हैं। आदर्श राज्य वही है जहाँ प्रत्येक नागरिक अपने समुदाय का अंग बने रहने के लिए कृत-संकल्प हो, जो राज्य का भार कम करना चाहता हो, जो अपने स्वार्थ के सामने राज्य के स्वार्थ को वरीयता देता हो, तथा आवश्यक होने पर जो अपनी आकांक्षाओं, सुविधाओं, समय और धन को भी त्याग देने के लिए उद्यत रहता हो। ऐसा मनुष्य ‘उस मशीन की भाँति कार्यशील रहता है जिसका कोई पुर्जा न तो व्यर्थ होता है और न अक्षमः न तो घिसा-पिटा होता है और न टूटा-पू$टाः अथवा अनुपयुक्त। ऐसी मशीन की एक-एक ‘पुली’ तथा ‘दाँता’ उसका सारा भार धारण करते हैं तथा मशीन के वेगपूर्ण सुचारु संचालन में पूरा योग देते हैं। जो मनुष्य अपना कर चुकाने में टालमटोल करता हो, वह तो घटिया नागरिक है ही; उसी प्रकार वह मनुष्य भी घटिया नागरिक है जो लोकसभा के लिए मतदान करते समय केवल अपने वैयक्तिक स्वार्थ का ध्यान रखता है, अथवा जो उदासीनता या आलस्य के कारण मतदान ही नहीं करता। उसी प्रकार का वह घटिया नियोजक है जो अपने कर्मचारियों के प्रति व्यवहार करते समय न केवल नैतिक कानून का उल्लंघन करता है बल्कि देख की सामाजिक समस्याओं को भी बढ़ाता है। इसी श्रेणी में ‘काला बाजार’ के मुनाफाखोर, व्यापारी लोग, तथा उनके अनुयायी भी सम्मिलित होंगे। इसी श्रेणी में वे श्रमिक-कारीगर सम्मिलित होंगे जो वैयक्तिक स्वार्थों के लिए ऐसे समय हड़ताल आयोजित करते हैं जब उनके देश का अस्तित्व दाँव पर लगा हो। इसी प्रकार का वह मनुष्य भी होगा जो स्थानीय शासन में उपयोगी हो सकता है, किन्तु जो अपने दायित्व से दूर रहना चाहता है। इसलिए नहीं कि वह समय नहीं निकाल सकता, बल्कि इसलिए कि वह इस कार्य के लिए समय नहीं निकालना चाहता।

सामान्य अध्ययन सिविल सेवा मुख्य परीक्षा अध्ययन सामग्री

प्रश्नः

(क) नागरिकता क्या है और क्या नहीं है? 12
(ख) ‘सक्रिय’ तथा ‘निष्क्रिय’ नागरिकता में अंतर कीजिए। 12
(ग) ‘आदर्श राज्य’ से लेखक का क्या अभिप्राय है? विस्तारपूर्वक समझाइए। 12
(घ) लेखक के अनुसार घटिया नागरिक कौन है?
(ङ) कोई राष्ट्र अपने नागरिकों से किन कर्तव्यों की अपेक्षा करता है? 12

3. निम्नलिखित अवतरण का सारांश लगभग 200 शब्दों में लिखिए और उसे एक उपयुक्त शीर्षक दीजिए। सारांश आपके अपने शब्दों में हो। उसे निर्धारित शीट पर ही लिखे और उत्तर-पुस्तिका के अन्दर मजबूती से बाँध दें। सारांश में प्रयुक्त शब्दों की संख्या का उल्लेख उसके अंत मं कर दें।

विशेष टिप्पणीः सारांश के शब्द निर्धारित सीमा से बहुत अधिक या बहुत कम होने पर अंक काटे जाएँगे।

दुःख थकान और स्नायविक तनाव का एक कारण हैµअपने निजी जीवन में जो व्यावहारिक महत्त्व की बात न हो, उसमें रुचि नहीं लेने की असमर्थता। इसका परिणाम यह होता है कि सचेतन मस्तिष्क कुछ विशिष्ट मामलों से विश्राम नहीं ले पाता और ये विशिष्ट मामले संभवतः उसकी चिन्ताओं, परेशानियों को बढ़ाते चलते हैं। निद्रा की स्थिति को छोड़ कर सचेतन मस्तिष्क कभी खाली नहीं रह पाता, जबकि अवचेतन का विचार धीरे-धीरे परिपक्व होता रहता है। परिणाम होता हैµउत्तेजना दूरदशर््िता का अभाव, चिड़चिड़ापन और संतुलनµबोध का Ðास। ये सभी थकान के कारक एवं परिणाम दोनों ही हैं। अधिक विश्रांत होने से मनुष्य की बाह्य अभिरुचियाँ मन्द पड़ने लगती हैं। उनके मन्द पड़ जाने पर उनसे प्राप्त राहत कम होने लगती है और मनुष्य अधिक विश्रांत होने लगता है। इस दोषपूर्ण चक्र की समाप्ति प्रायः एक विघटन के रूप में होती है।

बाह्य अभि$चियों के सम्बन्ध में सुखद तथ्य यह है कि वे किसी प्रकार के क्रिया-तंत्रा की अपेक्षा नहीं रखतीं। निर्णय करना तथा संकल्प-शक्ति का उपयोग करना उत्पन्न श्रम-साध्य कार्य हैµविशेषकर यदि इन्हें शीघ्रतापूर्वक और अवचेतन की सहायता के बिना पूरा करना हो। जो लोग ऐसे महत्त्वपूर्ण विषयों पर कोई महत्त्वपूर्ण निर्णय करने के पूर्व ‘‘सो जाना’’ पसन्द करते हैं, वे वस्तुतः ठीक करते हैं। किन्तु केवल निद्रावस्था में ही अवचेतन की मानसिक प्रक्रियाएँ गतिशील नहीं होती। मनुष्य के चेतन मस्तिष्क के अन्यत्रा व्यस्त रहते हुए भी वे गतिशील हो सकती है। कार्य पूरा हो जाने पर जो मनुष्य उस कार्य को भूल जाए और दूसरे दिन कार्य प्रारंभ होने तक उसे स्मरण न रखे वह उस अन्य व्यक्ति की अपेक्षा अपना कार्य सुचारु रूप से कर लेगा जो मध्यवर्ती समय में हमेशा अपने कार्य की ही चिन्ता करता रहता है। यदि किसी मनुष्य के सामने उसके कार्य के अथवा अनेक अभिरुचियाँ विद्यमान हों, तो उसके लिए वह कार्य भूल जाना बहुत सरल होगाµविशेष रूप से ऐसे समय में, जबकि उसे भूल जाना ही उचित हो। किन्तु इस बात का ध्यान रखना परम आवश्यक है कि इन अभिरुचियों का प्रभाव उसकी उन मानसिक शक्तियों के उ$पर न पड़े जो दैनिक कार्य करते रहने के कारण निर्बल हो चुकी हैं। इनमें इच्छाशक्ति तथा शीघ्र निर्णय करने का उलझाव नहीं होना चाहिए, द्यूत-क्रीड़ा की भाँति किसी वित्तीय पक्ष का समावेश नहीं होना चाहिए, और नियमतः इन्हें उत्तेजनापूर्ण भी नहीं होना चाहिए कि किसी प्रकार की भावात्मक थकान उत्पन्न करें अथवा अवचेतन के साथ साथ चेतन मस्तिष्क को भी ग्रस्त कर बैंठें।

अनेक प्रकार के मनोरंजन उपर्युक्त स्थितियों की पूर्ति करते हैं। इस दृष्टि से खेल-कूदों का अवलोकन करना, रंगशाला में जाना, गोल्फ खेलना इत्यादि सर्वाधिक निरापद हैं। पुस्तकीय रुझान वाले व्यक्ति के लिए अपने व्यावसायिक क्रियाकलापों से बाहर की पुस्तवें$ पढ़ना बहुत सन्तोषजनक होगा। चाहे कितनी महत्त्वपूर्ण चिन्ता की बात क्यों न हो, अपनी जाग्रतावस्था में कहीं भी उस पर ध्यान नहीं देना चाहिए। सभी प्रकार की अवैयक्तिक अभिरुचियाँ, शिथिलीकरण की महत्ता के अलावा, अन्यान्य दृष्टियों में उपयोगी हैं। जैसे, वे किसी व्यक्ति का सन्तुलन-बोध रखने में सहायता करती है। हमारे लिए अपने ही लक्ष्य का अनुसरण करना, अपने ही वृत्त में घूमना, अपने ही कामधन्धों में तल्लीन रहना इतना सरल है कि हम भूल जाते हैंµयह संपूर्ण मानवीय क्रिया-कलापों का कितना छोटा-सा अंश है। संसार में न जाने कितनी वस्तुएँ हमारी क्रियाओं से पूर्णतः अप्रभावित रहती हैं। आप पूछ सकते हेंµयह सब स्मरण रखने की आवश्यकता क्या है? इसके एकाधिक उत्तर हैं। सबसे पहले तो यही जानना श्रेयस्कर है कि हम इस संसार के यथार्थ स्वरूप से परिचित हों जहाँ नाना प्रकार के सुसंगत क्रिया-कलाप होते हैं। हममें से कोई भी व्यक्ति यहाँ दीर्घकाल के लिए नहीं आया। अपने जीवन के कुछ वर्षों में ही हमें इस विलक्षण ग्रह के विषय में, ब्रह्मांड के भीतर इसकी स्थिति के विषय में सभी कुछ अपेक्षित ज्ञान प्राप्त कर लेना है। ज्ञान-प्राप्ति के लिए अवसर की उपेक्षा करना, भले ही वह अधूरा हो, रंगशाला में जाकर नाटक नहीं देखने के बराबर है। यह संसार दुःखांत या सुखांत, वीरोेचित या अनोखी, आश्चर्यजनक वस्तुओं से भरा पड़ा है। और जो लोग इसके द्वारा प्रदत्त प्रदर्शन में रुचि नहीं ले पाते, वे लोग जीवन के कुछ विशेष अधिकारों से वंचित रह जाते हैं।

4. निम्नलिखित अवतरण का हिन्दी में अनुवाद कीजिएः

Many People in Europe think that they are very civilised and the people of Asia are quite barbarous .... You know that only a few years ago there was a great war. Most of the countries of the world were in it, and every one of them was trying to kill as many people on he other side as possible. The Englishman was trying his best to kill Germans, and the Germans were killing Englishman. Millions of people were killed in this war and many thousands were mained for life. You must have seen many of these war-wounded people in France and elsewhere. Do you think it was a very civilised or sensible thing for people to kill each other like this? It is just like two savages fighting in the jungles. And if the savages are called barbarous, how much more barbarous are the countries that behave in that way?

So it is not easy to understand what civilisation means. Fine buildings, fine pictures and books and everything that is beautiful are certainly signs of civilisation. But an even better sign is a fine man who is unselfish and works with others for the good of all.

5. निम्नलिखित अवतरण का अंग्रेजी में अनुवाद कीजिएः

यह एक स्वीकृत तथ्य है कि आज हमारे विश्वविद्यालयों में अत्यधिक अशान्ति व्याप्त है। हड़ताल, हिंसापूर्ण प्रदर्शन, राजनैतिक दलों का हस्तक्षेप, तथा समाज- विरोधी तत्व µ यहीं सब हमारे शैक्षिक जीवन के दैनंदिन लक्षण हो गए हैं। आज अध्यापक तथा अधिकारी-वर्ग छात्रा-जगत् की असाधारण शक्ति को देख कर अत्यधिक सचेतन हो गए हैं और घोर दुराचरण करने वाले अपराधियों के विरुद्ध वे किसी प्रकार की कार्यवाही करने में प्रायः असमर्थ में हो जाते हैं। यदि इन परिस्थितियों को सुधारने के लिए अविलंब कोई प्रभावशाली कदम नहीं उठाए गए तो शीघ्र ऐसा समय आएगा जब छात्रा स्वयं विश्वविद्यालयों का संचालन करने के लिए आन्दोलन करने लगेंगे जैसा कि उन्होंने यूरोप के अनेक विश्वविद्यालयों में किया था।

फिर भी, हमारे विश्वविद्यालयों में सभी प्रकार के उपद्रवों के लिए छात्रों को ही दोषपूर्ण सिद्ध करना अनुचित होगा। उनका व्यवहार अनेक ऐसे कारकों से प्रभावित होता है जिन पर उनका कोई नियंत्राण नहीं रहता। द्वितीय महायुद्ध के साथ-साथ प्राचीन जीवन-मूल्य लुप्त हो गए और नए जीवन-मूल्यों ने अभी तक जड़ें नहीं जमाई हैं। स्वतंत्राता का उत्तरवर्ती युग हमारे युवा वर्ग की अनेक आशा-आकांक्षाओं को पूर्ण करने में असफल सिद्ध हुआ है। हमारे विश्वविद्यालयों के अधिकांश छात्रा हतोत्साहित हो गए हैं।

तब उनके हतोत्साहित होने के क्या कारण हैं? एक प्रमुख कारण है छात्रों को बिना यह सोच-समझकर महाविद्यालयों में प्रवेश दे देना कि विश्वविद्यालय की शिक्षा से उनमें लाभान्वित होने की योग्यता है भी अथवा नहीं है? अमेरिका के विपरीत भारत जैसा एक निर्धन देश लोकतांत्रिक आधार पर विश्वविद्यालयीन शिक्षा प्रदान करने की आशा नहीं कर सकता। इसके स्थान पर उसे ब्रिटेन तथा अ्रन्य यूरोपीय देशों की प्रणाली का अनुसरण करना चाहिए जहाँ शिक्षा को बौद्धिक रूप से गुणवान लोगों तक प्रतिबन्धित कर दिया गया है।

6. (क) निम्नलिखित मुहावरों तथा लोकोक्तियों में से किन्हीं पाँच के अर्थ लिखिए और उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिएः 20

(i) आसमान में उड़ना
(ii) आँख लग जाना
(iii) उड़ती चिड़िया पहचानना
(iv) कलेजा मुँह को आना
(v) तिल का ताड़ बनाना
(vi) अपनी करनी पार उतरनी
(vii) जंगल में मोर नाचा किसने देखा
(viii) जल में रह कर मगर से बैर
(ix) मुँह में राम बगल में छूरी
(x) तीन लोक से मथुरा न्यारी।

(ख) निम्नलिखित युग्मों में से किन्हीं दो में दिए हुए शब्दों का इस प्रकार वाक्यों में प्रयोग कीजिए कि युग्म-शब्दों का अंतर यथासंभव स्पष्ट हो जाएः 10

(i) निरावरण - पर्यावरण
(ii) राजभाषा . राष्ट्रभाषा
(iii) अनुरागी - वीतरागी
(iv) करुणा - दया

(ग) निम्नलिखित शब्दों में से किन्हीं पाँच के विलोम शब्द लिखिएः 10

(i) औपचारिक
(ii) कदाचार
(iii) प्रशंसक
(iv) पराजय
(v) भूषण
(vi) महायोगी
(viii) वरदान
(ix) स्थावर
(ix) संगठित
(x) हानिप्रद

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