(अध्ययन सामग्री) हिन्दी साहित्य (पत्राचार पाठ्यक्रम) स्टडी किट - "भक्ति आंदोलन: सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व अथवा प्रदेय"

हिन्दी साहित्य
(पत्राचार पाठ्यक्रम)

1. भक्ति आंदोलन: सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व अथवा प्रदेय

भक्ति आंदोलन केवल कविता का ही आंदोलन नहीं है, बल्कि एक अखिल भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन है। इस आंदोलन का साहित्य ध्र्म और भक्ति की केन्द्रीयता के बावजूद महज पूजा-पाठ, ध्यान, उपासना और इनके जरिए मोक्ष की प्रेरणा देने वाला साहित्य नहीं है। भक्ति आंदोलन धर्मिक आवरण में भी मानवीय मूल्यों की स्थापना के पक्ष में खड़ा होने वाला और उसके लिए संघर्ष करने वाला आंदोलन है। यही वजह है कि अपनी तम्राम शक्ति और सीमाओं के बावजूद भक्ति आंदोलन का एक महत्वपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक प्रदेय है।

भक्तिकाल को सामाजिक-सांस्कृतिक संक्राति का युग माना जाता है। इस संक्रंाति का मुख्य कारण भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में इस्लाम ध्र्म का आगमन और प्रसार था। निःसंदेह इस्लाम के आगमन से उसे एक गहरा ध्क्का लगा। ऐसी परिस्थितियाँ में ही विभिन्न सम्प्रदायों में बँटे हुए भारतीय समाज को एक व्यापक हिन्दू ध्र्ममत के तले एकजुट होने के लिए विवश होना पड़ा। असल में, तत्कालीन सामाजिक-सांस्कृतिक चुनौतियों को इस प्रकार झेला जा सकता था और उसका प्रतिकार किया जा सकता था। ऐसे समय में ही ध्र्म और आध्यात्म के सहारे उन रास्तांे की खोज के प्रयास हुए जो जनता के एक बडे़ भाग को बिना किसी भेदभाव के जोड़ सके। इसके लिए विभिन्न संतों और भक्तों ने भक्ति के ध्रातल पर एक ऐसा आंदोलन चलाया जो समूचे देश को स्पंदित करने में बहुत हद तक सपफल रहा।

भक्ति आंदोलन और उसके साहित्य के महत्व को निर्गुण संतों की रचनाशीलता और सोच में लक्ष्य किया जा सकता है। तत्कालीन सामाजिक-सांस्कृतिक क्षितिज में नानक, दादू, कबीर नामदेव, रैदास और जायसी आदि संत-सूपिफयों का योगदान एक बड़ी उपलब्ध् िहै। इनकी सबसे बड़ी उपलब्ध् िहै-सामाजिक स्तर पर पाखण्ड एवं अंध्विश्वासों का पूरी दृढ़ता के साथ खंडन और विरोध्। मिथ्या आडंबरों के प्रति जैसी अनास्था इन संत कवियों ने व्यक्त की वैसी न तो पहले कोई समाज सुधरक कर सका और न ही परवर्ती युग में किसी का वैसा साहस हो सका। निम्न, दलित और शोषित जातियों से संबंध् रखने वाले इन संतों के आचरण की पवित्राता और सत्य के प्रति निष्ठा के कारण इनकी वाणी का प्रभाव समूचे समाज पर पड़ा।

निगुर्ण संतों व सूपफी कवियों की वाणी मानव समाज के सामूहिक कल्याण की वाणी है। मानव ध्र्म और मानव संस्कृति के लिए ये आजीवन संघर्षरत रहे। मनुष्यता के दुख दर्द से द्रविभूत होकर ही इनकी वाणी मुखर हुई थी। इन संतांे ने जिस तरह सामाजिक अन्याय और धर्मिक पांखड़ों का विरोध् किया वह उस युग की उपलब्ध् िहोने के साथ-साथ हमारी आज की विरासत भी है।

सामाजिक-सांस्कृतिक जागरण और परिवर्तन में सगुण भक्त कवियों का योगदान भी कम नहीं है। मनुष्य और उसकी नियति के प्रति सगुण भक्त कविता भी उतनी ही चिन्ताशील है जितनी की निर्गुण कविता। वैसे, सगुण भक्तों के यहाँ अन्तर्विरोध् भी दिखता है। इनके अन्तर्विरोध् का स्वरूप यह है कि जहाँ वे भक्ति आंदोलन की उदात मानवीय चेतना से जुड़ते हैं, मानुष सत्य का उद्घोष करते हैं और सामाजिक अन्याय का प्रतिवाद करते हैं। किन्तु जब वे भक्ति आंदोलन की उदात चेतना से अलग होते हैं तो उन परंपराओं व संस्कारों से बंध् जाते हैं जो शाड्ड सम्मत है, वेद विहित है। यह द्वंद सगुण भक्त कवियों में विशेषतः तुलसी में सबसे अध्कि मुखर होकर सामने आया है। लेकिन बावजूद इसके तुलसी और सूर में ऐसा बहुत कुछ है जो उन्हंे जनमानस की गहरी चिंताओं से जोड़ता है।

वस्तुतः समूचा भक्तिकाव्य प्रशस्त मानवीय सरोकारों का, गहरी मानवीय चिंता का और मानवीय करूणा का काव्य है। भले ही सभी कवियों की सामाजिक सोच एक जैसी न हो किन्तु उनका मूलवर्ती स्वर उदात है। भक्तिकाव्य सामाजिक न्याय का काव्य है।

भक्तिकाल की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि इस काल का साहित्य है। यद्यपि भक्तिकालीन कवि मूलतः भक्त थे और उन्होने किसी काव्यशास्त्रा का अध्ययन नहीं किया था, पिफर भी इन्होने जो उद्गार व्यक्त किए या जो लिखा वह काव्यहीन भी नहीं है। भक्तिकाल के संबंध् में इतना कहना ही पर्याप्त है कि मनुष्य के इंद्रियबोध् और भावजगत की समर्थतम अभिव्यक्ति हमंे इस काव्य में मिलती है। चाहे वह काव्य जायसी का हो, सूर का, मीरा का हो या पिफर तुलसी का।

यह कविता मानवीय चिंता की कविता है। मनुष्य का सुख-दुख हो या इनका आत्म-निवेदन, आख्यान तथा मुक्तक दोनों ही काव्य में इन भक्त कवियों ने मानव मन को गहराई तक जाकर छूआ और उसे उजागर किया है। यह कविता हमारे समक्ष संसार के सौदंर्य को शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध् के ऐन्द्रिय अनुभवों को उनकी संपूर्णता में खोलती है। भक्ति के अवरण के बावजूद वह हमें मनुष्य और जीवन के सारभूत सत्य से परिचित कराती है। भक्तिकाल की महता और उसके प्रभाव को इस बात से भी जाना जा सकता है कि वह अपने समय का अतिक्रमण कर हमारे अपने समय के महाकवियों का आदर्श बनी है, उन्हे प्रेरणा दे सकी है।

भक्तिकाव्य की एक उल्लेखनीय विशेषता इसका जनभाषा में रचा जाना है। यहाँ पहली बार कविता जनता की भाषा में जन-मन को संबोध्ति होती है। लोक जीवन के बीच इस काव्य की जो लोकप्रियता है इसका एक बड़ा कारण उसका लोकभाषा में लिखा जाना है। इस भाषा की लोकप्रियता का यही प्रमाण है कि इनकी रचनाएँ जनता के दैनिक व्यवहार और बोलचाल में सूक्तियों के रूप में स्थान पा सकी हैं।
भक्तिकाल के निगुर्ण और सगुण भक्ति कविता में तमाम विभिन्नताओं के बीच जो सामान्य तत्व दिखता है उनमें से एक तत्व है- पे्रम। सभी भक्त संतों का समान विश्वास है कि प्रेम से बढ़कर और कोई पुरूषार्थ नहीं है। वस्तुतः पे्रम भक्तिकाव्य का केन्द्रीय स्वर रहा है। इस प्रेम के समक्ष मनुष्य और मनुष्य के बीच सारे भेद नगण्य हैं। यह वह तार है जो सभी भेदों का अतिक्रमण करता हुआ मनुष्यता को एक सूत्रा में पिरोता है। लेकिन ध्यान रहे कि यह प्रेम किसी बाग-बगीचे या खेत में नहीं पैदा होता और न ही बाजार में बिकता है। कबीर कहते हैं-

प्रेम न बाड़ी उपजे, प्रेम न हाट बिकाए ।
राजा प्रजा जेहि रूचे, सीस देइ ले जाए ।।

इस प्रेम को प्राप्त करने के लिए शर्त यह है कि पहले भेद-बुद्धि और अहं का विसर्जन करना होगा, शीश उतारकर पहले जमीन पर रखना होगा, तभी इसे पाया जा सकता है। कबीर कहते हैं-

यह तो घरू है पे्रम का, खाला का घर नाहिं ।
शीश उतारे भुई ध्रे, वही बैठे एहिं माहि ।।

गोस्वामी जी के यहाँ भी उनके राम को यदि कुछ प्रिय है, तो यह प्रेम ही है, जिसमें अनन्यता है, समर्पण है, समस्त भेद-बुद्धि का त्याग है। मीरा इसी प्रेम को लेकर बावली रही और उससे उपजे दर्द को दर-दर भटकते हुए सबको बाँटती रही। सूरदास व जायसी के यहाँ भी यही प्रेम ईश्वर रूप बनकर व्याप्त है। कहने का आशय यह है कि ये संत-भक्त बराबर इस बात की ओर संकेत करते हैं कि ईश्वर से एकात्म होने के लिए जरूरी है कि पहले मनुष्य-मनुष्य से प्रेम करे। मानव प्रेम की बुनियाद पर ही वह इमारत खड़ी होगी जिसके भीतर पहुँचकर आराध्य का दीदार हो सकेगा।

भक्ति काल की एक बुनियादी विशेषता उसकी यह दृढ़ स्वीकृति है कि संसार असार या मिथ्या नहीं है। ये संत और भक्त भले ही अनहद नाद सुनते हांे, शून्य में समाध् िलगाते हांे, नित्य वृन्दावन में रमतें हो, कल्पना के रामराज्य में विचरते हांे किन्तु संसार के सुख-दुख से कभी विरत नहीं हुए हैं। इनकी भक्ति वैराग्य मूलक भक्ति नही है, बल्कि वह राग-तत्व को लेकर पल्लवित होने वाली भक्ति है। इन्होने बार-बार इस तथ्य को प्रतिपादित किया है कि इस भक्ति को पाने के लिए वैरागी बनने या घर छोड़ने की जरूरत नहीं है। इस संसार के बीच रहते हुए, अपने सारे दायित्वों को निभाते हुए और कर्म करते हुए मनुष्य इस भक्ति का अध्किारी हो सकता है, ईश्वर को पा सकता है।

इस कविता का एक अन्य महत्वपूर्ण आयाम लोक संस्कृति का उद्घाटन है। लोक संस्कृति का उद्घाटन ये कवि इसलिए कर पाए हैं कि ये स्वयं उसी संस्कृति की उपज थे। अवध् की लेाक संस्कृति जहाँ तुलसी और जायसी में अपनी सारी विशेषताओं के साथ मूर्त हुई है, वहीं सूरदास में ब्रज प्रदेश की लोक संस्कृति अपनी सारी मधुरता के साथ मौजूद है। मीरा के पदों में राजस्थान की लोक संस्कृति के स्वर गूंजे हैं। इन कवियों की भाषा में भी लोक-मन की अभिव्यक्ति देखी जा सकती है।

भक्ति-भावना को सम्प्रदाय या मत-पंथो से असम्पृक्त रखते हुए काव्य रचना करने वाले श्रेष्ठ कवि भी इसी काल में उत्पन्न हुए। इस काल में उन वर्गो ने संत पैदा किए जिन्हंे शूद्र या अंत्यज कहा जाता था। ऐसा पिफर आगे कभी नहीं हो सका। हमें भक्ति कविता के अन्तर्गत नारी भक्तों की भी एक जमात मिली जो उस युग के लिए सहज नहीं था। समुचे भक्तिकाल में एक साथ इतने कालजयी कवियों व भक्तों का अविर्भाव इस युग की एक खास विशेषता है।

भक्तिकाव्य की सामाजिक-सांस्कृतिक उपलब्धियों के इस विवेचन से स्पष्ट हैं कि यह काव्य गुण और परिमाण दोनो दृष्टियों से समृ( है। रचना वही महत्वपूर्ण होती है जो अपने समय के लिए तो जरूरी हो ही, आने वाले समय के लिए भी उतनी प्रांसगिक हो। भक्ति कविता ऐसी ही कविता है जो अपने समय में महत्वपूर्ण तो थी ही आज के समय के लिए भी अर्थवान है।

अजय अनुराग
(मार्गदर्शक, हिन्दी साहित्य - UPSCPORTAL)

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