(अध्ययन सामग्री) हिन्दी साहित्य (पत्राचार पाठ्यक्रम) स्टडी किट - "भक्ति अंदोलन: विघटन या सीमाएँ"

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भक्ति अंदोलन: विघटन या सीमाएँ

लगभग 300 वर्षो तक भारतीय जीवन को अनुप्राणित करने वाला भक्ति आंदोलन एक महान ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक घटना है। इस आंदोलन ने ध्र्म, समाज संस्कृति और यहाँ तक कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्रा को प्रभावित किया। भक्ति आंदोलन के व्यापक जनाधर की दृष्टि से इसमें देश की करोड़ो-करोड़ जनता विभिन्न भूभागों, प्रांतो, जातियों और सम्प्रदायों का भेद मिटाकर एक साथ शिरकत करती है। यही कारण है कि इसे मध्ययुग के एक महान जन-आंदोलन की संज्ञा भी दी गई है।

विभिन्न वर्गो तथा वर्ण व्यवस्था से जर्जर, धर्मिक भेदभाव, कर्मकांड, उँच-नीच एवं साम्प्रादिक भावना से प्रेरित भारतीय जीवन में भक्ति आंदोलन का प्रार्दुभाव और उसके द्वारा उद्घोषित मनुष्य सत्य उस समय की एक ऐसी अभूतपूर्व घटना है, जिसकी मिसाल नहीं है। लेकिन यहाँ उल्लेखनीय कि बावजूद अपनी इस व्यापकता और प्रभावशीलता के भक्ति आंदोलन अंततः बिखर गया। अपने जिन सामाजिक-संास्कृतिक उद्देश्यों के कारण वह इतना प्रभावशाली हो सका था, उसे पूरा करने से पहले ही आंदोलन की गति ध्ीमी पड़ गई और धीरे-धीरे उसकी व्यापकता एवं प्रभाव खत्म हो गए।

सवाल उठता है कि भक्ति आंदोलन के बिखरने के आखिर क्या कारण थे? इसके कारणांे की ओर संकेत करते हुए के॰ दामोदरन ने लिखा है कि ‘‘चूँकि भक्ति आंदोलन ध्र्म के आवरण में आया था और ध्र्म के लिए प्रेरणा मूलतः संवेदनात्मक होती है, तर्क करने अथवा युक्तिपूर्वक सोचने का मौका कम मिलता है। धर्मिक भावना न तो सामाजिक समस्याओं के तर्कसंगत विश्लेषण के लिए सक्षम है और न ही इन समस्याओं को युक्तियुक्त समाधान ढूंढने में वह सपफल होती है। यही वजह है कि भक्ति आंदोलन ने आम जनता में जागृति तो पैदा की, किन्तु वह सामाजिक और अर्थिक व्यवस्था में मौजूद असंगतियों को समझने और उनका कोई नया समाधन प्रस्तुत करने में सपफल नहीं हो सका।

श्री दामादोरन एक अन्य कारण की चर्चा करते हुए कहते हैं कि ‘यदि भक्ति आंदोलन सदा के लिए सामाजिक असमानतओं और जाति-प्रथा के अन्यायों को नहीं खत्म कर सका तो संभवतः इसका कारण यह था कि कारीगर, व्यापारी और दस्तकार जो इस आंदोलन के मुख्य आर्थिक आधर थे, अब भी कमजोर और असंगठित ही थे।’

भक्ति आंदोलन के अपने मूल्यवर्ती ताप को खो देने के कुछ और भी कारण थे। मसलन, विभिन्न सतो और भक्तों ने हिन्दू ध्र्म और सांमती व्यवस्था द्वारा स्थापित जिन सामाजिक रूढ़ियों और अंघविश्वासांे के खिलापफ अभियान चलाया, उसे वे व्यावहारिक रूप देने में सक्षम नहीं हो सके। बल्कि कहना यह चाहिए कि राजनीतिक तंत्रा इस आंदोलन का विरोध्ी था। इसलिए आंदोलन के दौरान जनता की उग्रता जैसे ही घटने लगी, यह सहमा हुआ संामतवाद पिफर से अपना असर दिखलाने लगा।

भक्ति आंदोलन के दौरान विभिन्न संतों और भक्तों ने जो अभियान चलाया था उसमें आगे चलकर पंथ व शिष्य सम्प्रदाय विकसित हो गया। उध्र, हिन्दू ध्र्म की सनातन धरा भी चल रही थी। ये पंथ और सम्प्रदाय हिन्दू ध्र्म की सनातन धरा पर धवा बोलने की बजाए सह-अस्तित्व बनाकर चलने लगे। बाद में इन सम्प्रदायों में भी कई तरह की रूढ़िवादिता और अंध्विश्वाआंे का प्रचलन हो गया। इन सबका नतीजा यह हुआ कि सनातन धरा और असहमत क्रांतिकारी धरा में कोई अतंर ही नहीं रह गया।

भक्ति आंदोलन में हमेशा यह द्वंद रहा है र्कि इंश्वर के समक्ष हर कोई बराबर है और यदि वह ;ईश्वरद्ध सामने न हो तो ऐसी स्थिति में जो पहले से चला आ रहा है उसे मानने के अलावा चारा ही क्या है। यह भी एक वजह रही कि क्रांतिकारी विचारधरा की सारी बाते ध्री की ध्री रह गई।

भक्ति आंदोलन विवेकसम्मत भावात्मक आंदोलन था लेकिन भक्त कवियो नें विवेक के घोड़े को रथ के पीछे बांध् रखा था इसलिए विवेक के ओझिल होते हीे जातिवाद, सम्प्रदायवाद आदि सभी समस्याएँ पिफर से खड़ी हो गईं। भक्ति आंदोलन के बिखरने का एक अन्य महत्वपूर्ण कारण इस आंदोलन का नेतृत्व उच्च वगों के हाथो में चला जाना था। इसके परिणामस्वरूप सामती ताकतों को पुनः अपने हाथ मजबूत करने और संगठित होने का अवसर मिल गया। यही नहीं निम्न वर्गो के बीच से पैदा हुए नेताओं ने भी सामंती घराने गठित कर लिए और बा्रह्ममणवाद की बुराईयों को अपना लिया। इन सबका नतीजा हुआ जिस सामंतवाद को ढ़हना था वह पिफर से जीवित हो उठा और आंदोलन के सारे उद्देश्यांे को निगल गया।

वैसे कुछ भी हो, इन सारे आरोह-अवरोह के बावजूद भारतीय जन जीवन के सबसे बड़े आध्यामिक, सामाजिक और संस्कृतिक अभ्युत्थान के रूप में भक्ति आंदोलन अपनी पहचान कराता है। कहना न होगा की इसकी तमाम सीमाआंे के बावजूद उसके प्रति मूलवर्ती धरणा यही रही है और यही रहेगी।

अजय अनुराग
(मार्गदर्शक, हिन्दी साहित्य - UPSCPORTAL)

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