(The Gist of Kurukshetra) कृषि में आधुनिक तकनीकों से बदलती तस्वीरें [May-2018]


(The Gist of Kurukshetra) कृषि में आधुनिक तकनीकों से बदलती तस्वीरें [May-2018]


कृषि में आधुनिक तकनीकों से बदलती तस्वीरें

बीते 70 सालो में भारत की कृषि प्रधमिकताएँ बदल गई है और देश की सड़को से लेकर खेत - खलिहानो तक दौड़ रहे भीमकाय ट्रेक्टरो व क्रेनों के दौर में अब बैलगाड़ी में अनाज के बोरों के इंतजार में लंबी लाइनें केवल पुराने चित्रों में देखने को मिलती हैं। आजादी के दो दशक बाद शास्त्री युग में हरितक्रांति का आह्वान होने तक कारखानों में सिमटी रही औद्योगिक क्रांति 1998 आते-आते "जय जवान जय किसान" के नारे में "जय विज्ञान" का समावेश करा चुकी थी। किंतु बीसवीं सदी के अंतिम दशक और इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के बीच बीते दो दशकों में मशीनी क्रांति की अति होने से हरियाली के अग्रदूत का वरदान शनैः शनैः प्रदूषण और संदूषण के अभिशाप का पर्याय बनता जा रहा है। जिस किसान ने देशवासियों की भूख के साथ ही देश के भंडारागारों को भी लबालब भर दिया है, उसके सामने अब संकट अधिकाधिक उत्पादन का नहीं, फसल पर हुए खर्च की लागत निकालने का है, और सरकारों के सामने चुनौती है लागत की डेढ़ गुना कीमत किसानों की झोली में डालने की। जैसे 1966 से 1999 तक कृषि तकनीक की बदौलत खेतों की हरियाली के अग्रदूत बने ट्यूबवेलों ने जोहड़ोंकुओंतालाबों, ढकुली रहट की जगह ले ली, दो बैलों की जोड़ी की जगह किसानों के खेतों में बड़े जमीदारों के ट्रैक्टरों से किराए पर जुताई होने लगी और ब्रेशर व कंबाइन कटाई यंत्रों के युग में "अनाज ओसाता हुआ किसान" भारतीय खलिहानों की पहचान नहीं रह गए। मैक्सिको के गेहूं और फिलीपींस के धान की दस्तक हुई तो यूरियाएनपीके की बोरियां और कीटनाशकों व बायोटेक्नोलॉजी आधारित रसायनों ने खेतों व किसान के द्वारे से बैलों और घर क बाहर गोबर के पूरे की विदाई का फरमान सुना दिया। निश्चित रूप से खेती की हरितक्रांति भौर गौशालाओं की दुनिया में आई श्वेतक्रांति के वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन और अमूल के यय रहे वर्गीज कुरियन को किसानों और शुपालकों के लिए वरदान के अग्रदूत के रूप में ज्यनीय बना दिया। किंतु यही स्वामीनाथन अब चिंतित है खेती की बढ़ती लगत से और विचलित है रसायनो व् टेक्नोलॉजी के अंधाधुंध इस्तेमाल से; आबोहवा, नदी, जल - जंगल जमीं में जहर घुलने और आसमान की ओजोन परत में छेद से होकर तारो, सितारों व् अंतरिक्ष से घातक विकिरण की आशंकाओं से।

युद्ध और अकाल दोनों से जूझते हुए द्वितीय प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री ने 1965 में दिल्ली के रामलीला मैदान "जय जवान जय किसान' का नारा दिया और इस नारे के जवाब में देश के किसानों ने पहली बार साढ़े सात करोड़ टन अनाज उत्पादन कर दिखाया। 742 लाख टन अनाज उत्पादन की तुलना आज से करें तो 2016-17 के दौरान 25.22 करोड़ टन (2522.24 लाख टन) उत्पादन शास्त्री जी के सपने को साकार करने जैसा है, क्योंकि 1952-52 में कुल 550 लाख टन अनाज देश में पैदा हुआ था और खाने के लिए अनाज का ऐसा संकट था कि 1962 से 1966 के बीच पांच वर्षों के भीतर अनाज का आयात ढाई गुना 1962 में 40 लाख टन, जबकि 1966 में 104 लाख टन अनाज आयात ) बढ़ाने पर भी शास्त्री जी को सप्ताह में एक दिन व्रत करने का आह्वान करना पड़ा। शास्त्री जी के दौर में देश आस्ट्रेलिया और अमेरिका का मुंह ताकने को मजबूर था जबकि आज भारतीय खाद्य निगम के भंडार भरे हुए हैं और भारत दुनिया के तीन शीर्ष निर्यातक देशों में शुमार है। 2016 में जब दाल की कीमतें सौ रुपये से ऊपर पहुंच गई थीं, केंद्रीय खाद्य और आपूर्ति मंत्री श्री रामबिलास पासवान ने देश को आश्वस्त किया था कि देश में छह सौ लाख टन गेहूंचावल आदि अनाज के भंडार मौजूद हैं जबकि मांग 549 लाख टन की थी, हां दलहन की मांग 235 लाख टन थी जबकि उत्पादन 170 लाख टन होने से 65 लाख टन दालें आयात करने की नौबत आ गई।

वर्ष 2018-19 के बजट में फसल की लागत का डेढ गुना मूल्य दिलाने के बाबत वित्तमंत्री श्री अरुन जेटली की घोषणा का मूलाधार वह टेक्नोलॉजी ही है। जिस पर सवार होकर सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और खुशहाली की बयार गांव - शहरों से लेकर राष्ट्रिय राजधानी क्षेत्र की हवाओं में घुले जहर से मुक्ति दिला सकती है। तकनीक की नीति और नींव पर आधारित एक दर्जन से भी ज्यादा योजनाएं ऐसी हैं जिन्हें बीते पांच महीनों के दौरान घोषित या लागू किया गया अथवा उनके लिए बजट का प्रावधान किया गया। इनमें जल और जंगल जैसे मूलतः प्राकृतिक संसाधनों के न्यूनतम दोहनप्रकृति पर प्रदूषण की मार से बचाते हुए कृषि, बागवानी, पशुपालनखाद्य भंडारण प्रसंस्करण और परिवहन के सेक्टरों परखासा जोर है और सस्ती स्वदेशी किंतु कारगर तकनीक की खोज करके किसानी की लागत घटाने की योजनाएं गौरतलब हैं। गांव में गंदगी का पर्याय बने गोबरखरपतवार और खेती व रसोई के अवशिष्टों जैसे जीवांशों के संरक्षण और स्वच्छता की पर्याय गोबर धन योजना तो एक ऐसी योजना है जिसमें मशीनमोटरबिजली हाथ के औजारों और परिवहन के छोटेबड़े साधनों से लेकर बायो टेक्नोलॉजी और नैनो साइंस की अनंत तकनीकी सभावनाए मौजूद हैं। गोबर धन दरअसल गोबर के सदुपयोग का संदेश देने वाली बहु-आयामी योजना के नाम में शुमार अंग्रेजी के प्रथमाक्ष का योग है जिसका पूरा नाम है गैल्वनाइज्ड आर्गेनिक बायो एग्री रिसोर्सेज।

डॉ वाचस्पति और आईआईटीबीएचयू के अभियांत्रिकी प्रोफेसर संतोष कुमार का कहना है कि बैलों की मदद से बिजली उत्पादन वास्तव में एक तरह से मुफ्त बिजली पैदा करने जैसी तकनीक है। यह तकनीक पानी खींचने की रहट और तेल या गन्ने का रस निकालने के बैलचालित कोल्हू की तकनीक पर ही काम करता है जिसे एक बार लगा देने के बाद देश के किसी भी जिले तहसील या कस्बों आदि ग्रामीण क्षेत्रों में काम कर रहे साधारण मेकेनिक भी देखसंभाल सकेंगे । जो तकनीक डॉ वाचस्पति ने पेटेंट आवेदन में उल्लिखित की है, वह है घूमते बैल से संचालित लकड़ी या लोहे के आधार भुजा से संचालित फ्री व्हील और फ्लाई व्हील वाली ड्राइव जिसे गेयर सिस्टम से गति देकर बिजली जनरेटर को संचालित करने लायक गति मिल जाती है। दो बैलों से संचालित 8 किलोवाट के बिजली संयंत्र की लागत एक बुलेट मोटरसाइकिल से भी कम या लगभग उसके बराबर ही आएगी। साथ ही उन बैलों का सदुपहयोग हो सकेगा जो अभी आवारा घूमते हैं और फसलों के लिए मुसीबत बने हुए हैं।

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Courtesy: Kurukshetra