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(GIST OF YOJANA) कौशल विकास को प्रोत्साहन [April-2018]


(GIST OF YOJANA) कौशल विकास को प्रोत्साहन [April-2018]


कौशल विकास को प्रोत्साहन

     21 वीं सदी की आर्थिक व्यवस्था ने नए आर्थिक मायने पेश किए हैं। इसी के साथ व्यवस्था ने आर्थिक पूंजी और राष्ट्र की ताकत को पारिभाषित करने के लिए नया मापदंड भी तैयार किया है। इस आर्थिक ताकत का एक अहम पहलू जनांकिकी लाभ है। किसी देश के जनांकिकी लाभ को उस देश की ग्रोथ की संभावना के तौर पर बताया जाता है। दरअसलयह वृद्धि देश की कुल आबादी की तुलना में कामकाजी आबादी (15-64 वर्षों: में तेज बढ़ोतरी के कारण मुमकिन हो सकती है है। पिछले दो दशकों से जहां अन्य देशों की कामकाजी आबादी के प्रतिशत में गिरावट आई है, वहीं भारत में इसमें लगातार बढ़ोतरी हो रही है। दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों ने इसे भारत का जनांकिकी लाभ' बताया है। ने यह भारत को अगले दशक तक पांच लाख का करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की दी दिशा में आगे बढ़ाने के लिए अहम पहलू है।

      इस लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए यह जरूरी है कि भारत अपनी कामकाजी आबादी को बेहतर तरीके से तैयार करे. ताकि जनांकिकी लाभ हासिल करने के लिए इस अनुकूल माहौल बन सके। ऐसे में कौशल विकास जैसे अहम स्वरूप की भूमिका सामने का आती है। भारत सरकार ने 15 जुलाई 2015 को कौशल विकास योजनाओं से जुड़े आम में नियमों को ध्यान में रखते हुए एक अधिसूचना राज्य जारी की थी। इसमें कौशल विकास की है। परिभाषा इस तरह दी गई है- 'किसी भी सरकारी योजना के मकसद से या किसी भी पूर्वी क्षेत्र आधारित मांग से जुड़ा कौशल संबंधी पर प्रशिक्षण जिससे रोजगार मिलता हो या ऐसी गतिविधि जो सहभागी को कौशल हासिल करने में मदद करती हो और कोई निष्पक्ष थर्ड पार्टी एजेंसी इसका आकलन कर इसे मान्यता देती हो। साथ ही, जिस प्रशिक्षण से किसी शख्स को मजदूरी स्वरोजगार मिलता हो और इससे कमाई में बढ़ोतरी होती हो और कामकाजी हालत में सुधार होता हो। मसलन किसी कौशल के लिए औपचारिक मान्यता, असंगठित से संगठित क्षेत्र संबंधी रोजगार की तरफ बढ़ना या उच्च शिक्षा प्रशिक्षण हासिल करना।' कौशल विकास के तहत किसी शख्स को किसी खास क्षेत्र में प्रशिक्षण दिया जाता है, ताकि कोई महिला पुरुष अपने ज्ञान और कौशल के स्तर के हिसाब से रोजगार बाजार में प्रवेश कर सके।

       असम में कौशल विकास को असम राज्य आजीविका मिशन और राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन के अलावा रोजगार उत्पादन मिशन (ईजीएम) के जरिये अंजाम दिया जाता है। इन स्कीमों ने पिछले कुछ वर्षों में पर्याप्त सफलता हासिल की है। वर्ष 2017 के आखिर में यह घोषणा की गई कि राज्यभर के रोजगार केद्रों को कौशल विकास केद्रों में बदला जाएगा। हाल में असम में कौशल विकास विभाग भी स्थापित किया गया है, जिसका मकसद असम में कौशल विकास को फैलाना है। असम सरकार ने अगले कुछ वर्षों में 3 लाख नए सदस्यों के प्रशिक्षण का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तैयार किया है। असम देश के उन शुरुआती राज्यों में है , जिसने कारागार पैरा कारीगर जैसी अनोखी स्किम पेश की है , जिसके तहत जेल में बंद लोगो को कौशल विकास का परिक्षण दिया जा रहा है ताकि जब वे समाज की मुख्यधारा में लोटे , तो समाज में सार्थक योगदान कर सके। इसके अलावा , सरकार ने सेक्टर ादाहृत कौशल विकास अभियानों के लिए सिस्को और डाबर जैसी कम्पनियो के साथ साझीदारी की है। इससे निश्चित तौर पर काफी लाभ होंगे।

        मणिपुर ने वैसी कई कमेटियों का गठन किया है, जो कौशल विकास के आइडिया को आगे बढ़ाने के लिए विभिन्न पक्षों के साथ मिलकर काम कर रही हैं। मणिपुर सरकार ने हाल में 1.5 लाख नौकरियां देने और हर घर में एक रोजगार देने के लक्ष्य का ऐलान किया है। राज्य के तमाम 40 कॉलेजों में व्यावसायिक (वोकेशनल) कौशल प्रशिक्षण केद्र की शुरुआत की गई है। सरकार ने कौशल विकास का प्रशिक्षण देने में महिला और आत्मसमर्पण कर चुके आतंकवादियों पर खास ध्यान दिया है।

        मेघालय राज्य कौशल विकास सोसायटी ने कौशल विकास में पहले चरण के तहत7,700 युवाओं को प्रशिक्षित किया है। साथ ही, अलग-अलग उद्योगों और क्षेत्रों में उनके लिए नौकरी भी सुनिश्चित की है। डीडीयू-जीकेयू (दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना) का मकसद ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षित करना और उन्हें रोजगार बाजार में लाना है। इस संबंध में काम करने के लिए जापान और कोरिया जैसे देशों में उप्रदराज लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, लिहाजा इन देशों में कौशल से लैस कामगारों की जरूरत होगी। भारत इस जरूरत की भरपाई कर सकता है और उसका पूर्वोत्तर इलाका इन देशों की जरूरत पूरी करने के लिहाज से सबसे उपयुक्त है। मेघालय सर्कार ने भी कुछ अहम क्षेत्रो की पहचान की है। योजना के तहत पहचान किये गए क्षेत्रों में पर्यटन, ऑटोमोबाइल मैकेनिक , होउसकीपिंग आदि शामिल है।

      असम सर्कार इस सिलसिले में पहले ही ढांचा और नक्शा पेश कर चुकी है। मिसाल के तौर पर असम में बारपेटा जिले में आईटीआई और बाकि संसथान है , जो स्थानीय आतिशबाजी और हस्तकला के क्षेत्र में परिक्षण मुहैया करता है। यह जिला पारम्परिक तौर पर भी आतिशबाजी उधोग और हस्तकला के लिए जाना जाता है। पारपरिक क्षेत्रों के ज्ञान को कौशल में शामिल करने के लिए पाठ्यक्रमो में बदलाव किया जा सकता है और इसे नए सिरे से इस तरह तैयार किया जा सकता है कि प्रशिक्षित युवा बाजार की जरूरतों के मुताबिक तैयार हो सके। साथ ही, क्लस्टर सिस्टम में मौजूद छोटे एमएसएमई उद्योगों को प्रोत्साहित किया। जाना चाहिए। इकोसिस्टम यह पक्का करेगा कि कौशल विकास रोजगार हासिल करने के अपने लक्ष्य तक पहुंचे इसी तरह का मॉडल कछार जिले में भी विकसित किया जा सकता है, जो मिट्टी के बरतन और शीतल पाटी जैसे कामों के लिए मशहूर है। सोनितपुर जिले को चावल मिल के अहम केंद्र के तौर पर विकसित किया जा सकता है। इस जिले की अनुभव और विशेषज्ञता इसी क्षेत्र में है।    

कौशल विकास को और बढ़ावा देने  वाला दूसरा उपाय इसे अंतरराष्ट्रीय मार्केट से  जोड़ना है। यह काम वैसे नए क्षेत्रों की पहचान कर किया जा सकता है, जहां संबंधित क्षेत्रों ए के पारंपरिक ज्ञान का इस्तेमाल पड़ोसी देशों में कुछ खास उत्पादों के लिए बाजार तैयार करने में किया जा सकता है। इस मॉडल को बांग्लादेश में प्राण फूड्स ने दोहराया है। बांग्लादेश की इस खाद्य प्रसंस्करण कंपनी ने लीची जूस उत्पाद पेश कर पूर्वोत्तर में खुद के लिए खास बाजार तैयार किया है। पिछले कुछ वर्षों में कंपनी ने पूर्वोत्तर के इलाके में बड़ी संख्या में पकड़ मजबूत की है। पूर्वोत्तर राज्यों को इस सीमा पार व्यापार का फायदा उठाना चाहिए और ऐसे उद्योगों पर नजर रखनी चाहिए, जो पड़ोसी देशों को उनकी जरूरत वाले उत्पाद मुहैया करा सके। मिसाल के तौर पर पूर्वोत्तर में गमछा और शॉल के रूप में हस्तकला की समृद्ध परंपरा का इस्तेमाल कर पड़ोसी देशों के बाजार में नए उत्पादों का विकल्प पेश किया जा सकता है। बांग्लादेश के प्राण फूड मॉडल का इस्तेमाल वैसे क्षेत्रों की पहचान में किया जाना चाहिए जहां पूर्वोत्तर के राज्य मेहनत कर सकते हैं। इन राज्यों को पूर्वी एशियाई देशों के करीब होने का फायदा उठाना चाहिए और इसके जरिये आर्थिक समृद्धि हासिल करना चाहिए तीसरे उपाय के तौर पर राष्ट्रीय कौशल योग्यता ढांचा (एनएसक्यूएफ) के मानकों को अपनाकर नतीजा आधारित सिस्टम की तरफ बढ़ना हो सकता है।  इस मॉडल को अपनाने के बाद हर राज्य की प्रगति और गढ़बढ़ियो का नियमित तौर पर आकलन संभव हो सकेगा। साथ ही गढ़बढ़ियो को दूर भी किया जा सकता है महत्वकांक्षी युवाओ को भी कम उम्र में चिन्हित करने की जरूरत है. न ताकि प्रशिक्षण छोड़कर जाने वालों को रोका जा सके। स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम को व्यावासायिक स्वरूप देना इस सिलसिले में स्वागतयोग्य कदम है। पूर्वोत्तर के युवाओं में उद्यमी क्षमता तैयार करने के लिए स्कूली स्तर पर उद्यमियों की सफलता की प्रेरणादायी कहानियां पढ़ाई जानी चाहिए।

पूर्वोत्तर के बाकी राज्य भी उन खास क्षेत्रों की पहचान के लिए कौशल के आकलन का अभियान चला सकते हैं, जहां पारंपरिक ज्ञान या ऐतिहासिक या भौगोलिक पृष्ठभूमि के जरिये मजबूत केंद्र बनाया जा सकता है। त्रिपुरा रबड़ का बड़ा उत्पादकबनने की अपनी जबरदस्त संभावना को लेकर काम कर सकता है। त्रिपुरा में तैयार किए रबड़ को पड़ोसी देशों में भी निर्यात किया जा सकता है।

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      यह भी याद रखा जाना चाहिए कि कौशल विकास का काम बड़ा है, जबकि उपलब्ध इफ्रास्ट्रक्चर सीमित है। पूर्वोत्तर राज्यों को कौशल विकास के लिए बिना इस्तेमाल वाले सरकारी अवसंरचना का इस्तेमाल करना चाहिएइससे वे राज्य अवसंरचना संबंधी चुनौतियों से असरदार तरीके से निपट पाएंगे। कौशल विकास पर संशोधित राष्ट्रीय नीति मौजूदा अवसंरचना संबंधी सुविधाओं के अधिकतम इस्तेमाल के सवाल पर दिशा-निर्देश मुहैया कराती है। इस इलाके में निजी प्रशिक्षण प्रदाताओं की मौजूदगी भी बढ़नी चाहिएइसके मद्देनजर इस इलाके में मौजूद कंपनियों को सीएसआर से जोड़ने और संबंधित क्षेत्र के लिए प्रशिक्षण प्रदाता के तौर पर काम करने के उपाय भी सामने आ सकते हैं।

कौशल विकास को और बढ़ावा देने वाला दूसरा उपाय इसे अंतरराष्ट्रीय मार्केट से जोड़ना है। यह काम वैसे नए क्षेत्रों की पहचान कर किया जा सकता है, जहां संबंधित क्षेत्रों ए के पारंपरिक ज्ञान का इस्तेमाल पड़ोसी देशों में कुछ खास उत्पादों के लिए बाजार तैयार करने में किया जा सकता है। इस मॉडल को बांग्लादेश में प्राण फूड्स ने दोहराया है। बांग्लादेश की इस खाद्य प्रसंस्करण कंपनी ने लीची जूस उत्पाद पेश कर पूर्वोत्तर में खुद के लिए खास बाजार तैयार किया है। पिछले कुछ वर्षों में कंपनी ने पूर्वोत्तर के इलाके में बड़ी संख्या में पकड़ मजबूत की है। पूर्वोत्तर राज्यों को इस सीमा पार व्यापार का फायदा उठाना चाहिए और ऐसे उद्योगों पर नजर रखनी चाहिए, जो पड़ोसी देशों को उनकी जरूरत वाले उत्पाद मुहैया करा सके। मिसाल के तौर पर पूर्वोत्तर में गमछा और शॉल के रूप में हस्तकला की समृद्ध परंपरा का इस्तेमाल कर पड़ोसी देशों के बाजार में नए उत्पादों का विकल्प पेश किया जा सकता है। बांग्लादेश के प्राण फूड मॉडल का इस्तेमाल वैसे क्षेत्रों की पहचान में किया जाना चाहिए जहां पूर्वोत्तर के राज्य मेहनत कर सकते हैं। इन राज्यों को पूर्वी एशियाई देशों के करीब होने का फायदा उठाना चाहिए और इसके जरिये आर्थिक समृद्धि हासिल करना चाहिए तीसरे उपाय के तौर पर राष्ट्रीय कौशल योग्यता ढांचा (एनएसक्यूएफ) के मानकों को अपनाकर नतीजा आधारित सिस्टम की तरफ बढ़ना हो सकता है। इस मॉडल को अपनाने के बाद हर राज्य की प्रगति और गढ़बढ़ियो का नियमित तौर पर आकलन संभव हो सकेगा। साथ ही गढ़बढ़ियो को दूर भी किया जा सकता है महत्वकांक्षी युवाओ को भी कम उम्र में चिन्हित करने की जरूरत है. न ताकि प्रशिक्षण छोड़कर जाने वालों को रोका जा सके। स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम को व्यावासायिक स्वरूप देना इस सिलसिले में स्वागतयोग्य कदम है। पूर्वोत्तर के युवाओं में उद्यमी क्षमता तैयार करने के लिए स्कूली स्तर पर उद्यमियों की सफलता की प्रेरणादायी कहानियां पढ़ाई जानी चाहिए।

     यह भी याद रखा जाना चाहिए कि कौशल विकास का काम बड़ा है, जबकि उपलब्ध इफ्रास्ट्रक्चर सीमित है। पूर्वोत्तर राज्यों को कौशल विकास के लिए बिना इस्तेमाल वाले सरकारी अवसंरचना का इस्तेमाल करना चाहिएइससे वे राज्य अवसंरचना संबंधी चुनौतियों से असरदार तरीके से निपट पाएंगे। कौशल विकास पर संशोधित राष्ट्रीय नीति मौजूदा अवसंरचना संबंधी सुविधाओं के अधिकतम इस्तेमाल के सवाल पर दिशा-निर्देश मुहैया कराती है। इस इलाके में निजी प्रशिक्षण प्रदाताओं की मौजूदगी भी बढ़नी चाहिएइसके मद्देनजर इस इलाके में मौजूद कंपनियों को सीएसआर से जोड़ने और संबंधित क्षेत्र के लिए प्रशिक्षण प्रदाता के तौर पर काम करने के उपाय भी सामने आ सकते हैं।

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Courtesy: Yojana